शब्द शक्ति
परिभाषा – शब्द के अर्थ को जिस माध्यम से ग्रहण किया जाता है, वह माध्यम शब्द-शक्ति कहलाता है।
भारतीय काव्य – शास्त्र के प्रकांड विद्वान् मम्मट ने अपनी पुस्तक ‘काव्यप्रकाश’ में तीन प्रकार के शब्द और तीन
प्रकार के अर्थ का निर्देश किया है। उन्होंने वाच्य, लक्ष्य
और व्यंग्य तीन प्रकार के अर्थ माने हैं।
शब्द के उपर्युक्त विभाजन को हम इस प्रकार समझ सकते हैं –
(1) वाचक शब्द – (वाच्य अर्थी) – वक्ता द्वारा बोले गये वाक्य का सीधा अर्थ ग्रहण करना। जैसे-‘मैं राजस्थानी हूँ।’ इसमें वक्ता के इस वाक्य का
सीधा (वाच्य) अर्थ होगा कि वह राजस्थान का रहने वाला है।
(2) लक्षक शब्द – (लक्ष्य अर्थ)- जहाँ वक्ता द्वारा बोले गये शब्द का लक्षणों के आधारे अर्थ ग्रहण किया जाय। जैसे-मैं राजस्थानी हूँ । इस वाक्य में यदि ‘राजस्थानी’ को राजस्थान की संस्कृति का द्योतक माना जाय, तो यह लक्षण शब्द होगा और राजस्थानी संस्कृति इसका लक्ष्यार्थ होगा।
(3) व्यंजक शब्द – (व्यंग्य अर्थ) – जहाँ वक्ता का भाव लक्षणों द्वारा भी अभिव्यक्त नहीं हो पाता और अन्य अर्थ की कल्पना करनी होती है, वहाँ शब्द व्यंजक होता है। जैसे (सावधान !) मैं राजस्थानी हूँ।’ राजस्थानी’ शब्द का अभिप्रेत अर्थ लक्षणों से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इससे राजस्थान के वीरों की वीरता व्यंजित होती है । अत : यह शब्द व्यंजक है और इसका व्यंग्य अर्थ है- ‘वीरता’।
(2) लक्षक शब्द – (लक्ष्य अर्थ)- जहाँ वक्ता द्वारा बोले गये शब्द का लक्षणों के आधारे अर्थ ग्रहण किया जाय। जैसे-मैं राजस्थानी हूँ । इस वाक्य में यदि ‘राजस्थानी’ को राजस्थान की संस्कृति का द्योतक माना जाय, तो यह लक्षण शब्द होगा और राजस्थानी संस्कृति इसका लक्ष्यार्थ होगा।
(3) व्यंजक शब्द – (व्यंग्य अर्थ) – जहाँ वक्ता का भाव लक्षणों द्वारा भी अभिव्यक्त नहीं हो पाता और अन्य अर्थ की कल्पना करनी होती है, वहाँ शब्द व्यंजक होता है। जैसे (सावधान !) मैं राजस्थानी हूँ।’ राजस्थानी’ शब्द का अभिप्रेत अर्थ लक्षणों से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इससे राजस्थान के वीरों की वीरता व्यंजित होती है । अत : यह शब्द व्यंजक है और इसका व्यंग्य अर्थ है- ‘वीरता’।
शब्द के उपर्युक्त विभाजन के आधार पर शब्द की क्रमशः तीन
शक्तियाँ मानी गई हैं। ये निम्नलिखित हैं –
1.
अभिधा शक्ति
2.
लक्षणा शक्ति
3.
व्यंजना शक्ति
1. अभिधा-शक्ति
वाच्यार्थ (मुख्यार्थ) का बोध कराने वाली शक्ति को अभिधा शक्ति कहा जाता है। अभिधा को संबंध शब्द का एक ही अर्थ ग्रहण करने
से है।
उदाहरणार्थ – किसी ने कहा- पानी दो, इस वाक्य का अर्थ अभिधा के
माध्यम से कवल इतना ही होगा कि पानी पीने के लिए। माँगा गया है। वस्तुत: अभिधा में
जो बोला जाता है और सुनकर प्रथम बार में ही जो अर्थ ग्रहण किया जाता है, वही अर्थ-ग्रहण की प्रक्रिया इसके अंतर्गत आती है।
अन्य उदाहरण –
1.
‘किसान फसल काट रहा है।‘ इस वाक्य में अभिधा शब्द-शक्ति के
माध्यम से यही प्रकट होता है कि फसल किसान द्वारा काटी जा रही है।
2.
‘बिल्ली भाग रही है। इस वाक्य में केवल बिल्ली का भागना ही
प्रकट होता है। अत: वाच्यार्थ का ही ग्रहण होने से अभिधा शब्द शक्ति प्रकट होती
है।
3.
‘जयपुर राजस्थान की राजधानी है।’ यहाँ भी वाच्यार्थ का सीधे ही अर्थ
ग्रहण हो रहा है। अत: अभिधा शब्द शक्ति है।
2. लक्षणा-शक्ति
जब शब्द के वाच्यार्थ (मुख्यार्थ) का अतिक्रमण कर किसी दूसरे
अर्थ को ग्रहण किया जाता है, तब उसे लक्ष्यार्थ कहते हैं। लक्ष्यार्थ का बोध कराने वाली शक्ति को लक्षणा-शक्ति कहा जाता है। जबे वक्ता अपने वाक्य में मुख्यार्थ से हटकर
कुछ अन्य अर्थ भरने की कोशिश करता है, तब लक्षणों के आधार पर
अर्थ-ग्रहण किया जाता है।
लक्षणा के भेद – काव्यशास्त्र के आचार्यों ने लक्षण के दो प्रमुख भेद माने
हैं –
1.
रूढ़ा लक्षणा
2.
प्रयोजनवती लक्षणा।
(1) रूढ़ा लक्षणा – जब किसी काव्य-रूढ़ि
(परम्परा) को आधार बनाकर लक्षणा-शक्ति का प्रयोग किया जाता है, तो वहाँ रूढ़ा लक्षणा
मानी जाती है । जैसे- भारत जाग उठा’ इस वाक्य में ‘भारत’ से वक्ता का तात्पर्य ‘भारत देश’ न होकर भारतवासी हैं। ‘भारत’ शब्द का भारतवासी अंर्थ में
प्रयोग कविगण तथा लेखक करते आ रहे हैं। इसी रूढ़ि को आधार बनाकर भारतवासियों के
सचेत और जागरूक होने की बात कही गई है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण हैं –
1.
इंग्लैण्ड की चार विकेट से पराजय।
2.
भरत हंस रवि वंश तडागा।
3.
वहाँ लाठियाँ चल रही हैं।
4.
बड़े हरिश्चन्द्र बनते हो।
5.
कश्मीर रक्त में डूबा हुआ है।
यहाँ ‘इंग्लैण्ड’ शब्द से इंग्लैण्ड के क्रिकेट खिलाड़ी, ‘हंस’ से गुण-दोष का ज्ञाता, लाठियाँ’ से लाठी चलाते व्यक्ति, ‘हरिश्चन्द्र’ से सत्य बोलने वाला तथा ‘कश्मीर’ से कश्मीर निवासियों का
तात्पर्य रूढ़ि पर आधारित है । अतः उपर्युक्त वाक्यों में रूढ़ा लक्षणा-शक्ति का
प्रयोग है।
(2) प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ विशेष प्रयोजन से प्रेरित होकर शब्द का प्रयोग
लक्ष्यार्थ में किया जाता है, तो वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा मानी
जाती है। जब किसी शब्द का मुख्यार्थ न लेकर प्रयोजन से उसका लक्ष्यार्थ
लिया जाता है, उसे प्रयोजनवती लक्षणा कहा जाता है। जैसे-‘तुम तो निरे गधे हो।’ इस वाक्य में ‘गधा’ शब्द का ‘मूर्ख’ के अर्थ में प्रयोग विशेष प्रयोजन से हुआ है। अत: यहाँ
प्रयोजनवती लक्षणा है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण हैं –
1.
आओ मेरे शेर।
2.
उसका मन पत्थर का बना है।
3.
हम तो गंगावासी हैं।
4.
यह ताजमहल कब तक पूरा होगा?
5.
यह यमुना-पुत्रों का नगर है।
इन वाक्यों में प्रयुक्त काले छपे शब्दों का प्रयोग विशेष
प्रयोजन से हुआ है। यहाँ ‘शेर’ अर्थात् ‘शेर’ जैसे गुणों वाला, निर्भीक और बलशाली, ‘पत्थर’ अर्थात् पत्थर जैसे कठोर हृदय
वाला, ‘गंगावासी’ अर्थात् गंगा जैसी पवित्रता से
युक्त, ‘ताजमहल’ अर्थात् ताजमहल जैसा भव्य भवन
और ‘यमुना-पुत्र’ अर्थात् यमुना पर आधारित
आजीविका वाला होगा।
3. व्यंजना-शक्ति
वाच्यार्थ (मुख्यार्थ) लक्ष्यार्थ
(लक्ष्य) और संकेतित अर्थ के पश्चात् जब किसी विलक्षण अर्थ की प्रतीति होती है, उसे व्यंग्यार्थ (व्यंजनार्थ, ध्वन्यार्थ) कहते हैं। जिस शब्द शक्ति से व्यंग्यार्थ का बोध होता है, उसे व्यंजना शक्ति कहते
हैं।
जब यह कहा जाये, ‘क्यों क्या समय हुआ है ? ‘तो वक्ता का तात्पर्य न तो घड़ी का समय पूछना है और न समय का
आभास देना है,
अपितु उसका तात्पर्य है यह कोई समय है
आने का ? यह अर्थ न मुख्यार्थ ग्रहण करने से प्राप्त होगा, न लक्ष्यार्थ से। यही व्यंग्यार्थ है।
व्यंजना के भेद – व्यंजना शक्ति के दो भेद होते हैं- शाब्दी व्यंजना व आर्थी
व्यंजना।
1.
शाब्दी व्यंजना – जहाँ व्यंग्यार्थ किसी विशेष शब्द के
प्रयोग पर आश्रित रहता है, वहाँ
शाब्दी व्यंजना होती है। इसका प्रयोग अनेकार्थवाची शब्दों के प्रयोग में होता है।
2.
आर्थी व्यंजना – जहाँ व्यंग्यार्थ अर्थ पर ही आश्रित
रहता है, वहाँ
आर्थी व्यंजना होती है ।
उदाहरण – (1) कुम्हार बोला, “बेटी, बादल हो रहे हैं”।
उक्त वाक्य में भिन्न-भिन्न व्यंग्यार्थ निकल रहे हैं, जैसे-बर्तन अन्दर ले लो। मिट्टी गीली हो जायेगी। हमें बाहर
नहीं जाना चाहिए।
(2) उसने कहा, ”संध्या हो गई।”
इसके कई व्यंग्यार्थ हैं, जैसे- गायों के आने का समय हो गया है। बत्ती जलाने का समय है। हमें मन्दिर चलना है। आदि।
इसके कई व्यंग्यार्थ हैं, जैसे- गायों के आने का समय हो गया है। बत्ती जलाने का समय है। हमें मन्दिर चलना है। आदि।
(3) दस बज गए हैं।
इस वाक्य के व्यंग्यार्थ हैं – विद्यालय की घंटी बजने वाली है। बस आने का समय हो गया है । पिताजी कार्यालय जाने वाले हैं। आदि।
इस वाक्य के व्यंग्यार्थ हैं – विद्यालय की घंटी बजने वाली है। बस आने का समय हो गया है । पिताजी कार्यालय जाने वाले हैं। आदि।
अभिधा तथा लक्षणा से प्राप्त अर्थ में अन्तर
अभिधा शक्ति से शब्द का मुख्य या सामान्यतया प्रचलित अर्थ
व्यक्त होता है। अभिधा से व्यक्त अर्थ को यथावत् ग्रहण किया जाता है । पॐ या
श्रोता को अपनी कल्पना या अनुमान को प्रयोग नहीं करना पड़ता। अभिधेयार्थ अपने आप
में स्पष्ट और पूर्ण होता है, जबकि लक्षणा से प्राप्त होने
वाले अर्थ को मुख्यार्थ से हटकर लक्षणों के आधार पर निश्चित किया जाता है। पाठक या
श्रोता को प्रसंगानुसार अपनी कल्पना और तर्क-शक्ति के उपयोग से अभीष्ट अर्थ तक
पहुँचना होता है । इस प्रकार शब्द के मुख्य अर्थ से हटकर, लक्षणों के आश्रय से प्राप्त होने वाला भिन्न या नवीन अर्थ
लक्षणा-शक्ति से ही व्यक्त होता है। जैसे –
(क) ढल रही है रात, आता है सवेरा।
(ख) जीवन में ‘रात’ विदा होती, शीघ्र ‘सवेरा’ आयेगा।
(ख) जीवन में ‘रात’ विदा होती, शीघ्र ‘सवेरा’ आयेगा।
यहाँ प्रथम वाक्य में ‘रात’ तथा ‘सवेरा’ शब्दों का प्रयोग अपने सामान्य या मुख्य अर्थ में हुआ है, जबकि द्वितीय वाक्य में ‘रात’ का अर्थ ‘कष्ट’ या ‘अज्ञान’ लेना होगा और ‘सवेरा’ का अर्थ ‘सुख के दिन या ज्ञानोदय’ ग्रहण किया जायेगा। अत: प्रथम वाक्य में अभिधा-शक्ति का
प्रयोग हुआ है और द्वितीय वाक्य में लक्षणा-शक्ति का।
लक्षणा तथा व्यंजना शक्ति में अन्तर
मुख्य या प्रचलित अर्थ से हटकर जब अर्थ ग्रहण करना पड़ता है
तो वहाँ लक्षणा शब्द-शक्ति कार्य करती है । जब ‘मुख्यार्थ
और लक्ष्यार्थ’
दोनों ही वक्ता के इच्छित अर्थ को
प्रकट नहीं कर पाते, तो वहाँ प्रसंग के आधार पर अन्य
अर्थ की कल्पना या अनुमान करना पड़ता है । इस प्रकार प्राप्त होने वाला अर्थ
व्यंग्यार्थ होता है । यहाँ शब्द की व्यंजना शक्ति कार्य करती है। यथा –
‘तने की अटरिया पै चढ़ि आई घाम’।
इस पंक्ति का साधारण अर्थ होगा कि शरीर की अट्टालिका. पर धूप
चढ़ रही है । लेकिन लक्ष्य के अनुसार इसका अर्थ होगा कि ‘अब वृद्धावस्था आ गई है।’ जब
वक्ता इस कथन द्वारा यह भाव व्यक्त कराना चाहेगा कि ‘अब सांसारिक मोह त्याग दो, भजन
करने का समय आ गया है, तो यह व्यंग्यार्थ होगा और
व्यंजना-शक्ति के द्वारा ही व्यक्त होगा।
अभिधा तथा व्यंजना शक्ति में अतर
‘अभिधा’ शब्द की वह शक्ति मानी गई है, जिसके द्वारा शब्द का सामान्य प्रचलित अर्थ प्रकट होता है।
जैसे- रमेश पुस्तक पढ़ रहा है। यहाँ प्रत्येक शब्द का मुख्य अर्थ ही प्रकट होता
है। जैसे- मुर्गा बोल रहा है। इसका व्यंग्यार्थ यह है कि सवेरा हो गया, अब जागे जाओ। अर्थात् इसमें सामान्य अर्थ ग्रहण करने पर भाव
प्रकट नहीं होता है।
.निम्नलिखित वाक्यों में किस-किस शब्द-शक्ति का प्रयोग हुआ है ?
(1) प्रेम सदा अन्धा होता है।- व्यंजना शब्द-शक्ति
(2) उफ ! आज तो पत्ता भी नहीं हिल रहा है। - लक्षणा शब्द-शक्ति
(3) प्रात:कालीन-भ्रमण स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। - अभिधा शब्द-शक्ति
(2) उफ ! आज तो पत्ता भी नहीं हिल रहा है। - लक्षणा शब्द-शक्ति
(3) प्रात:कालीन-भ्रमण स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। - अभिधा शब्द-शक्ति
(4)
देश की नाव मझधार में है। - लक्षणा शब्द-शक्ति
(5) माता ने छोटे पुत्र से कहा, ‘अँधेरा हो गया है।’ - व्यंजना शब्द-शक्ति
(5) माता ने छोटे पुत्र से कहा, ‘अँधेरा हो गया है।’ - व्यंजना शब्द-शक्ति
अलंकार
अर्थ और स्वरूप – अलंकार शब्द का सामान्य अर्थ आभूषण है। आभूषण जिस प्रकार
शरीर की शोभा बढ़ाने के लिए धारण किए जाते हैं, उसी
प्रकार काव्य की शोभा-वृद्धि के लिए अलंकार प्रयोग किए जाते हैं। काव्यशास्त्र के
आचार्य दंडी ने भी कहा है
काव्य शोभाकरान् धर्मान्
अलंकारान् प्रचक्षते।”
अर्थात् काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्द ही अलंकार हैं।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी अलंकारों को काव्य में प्रस्तुत भाव को उत्कर्ष देने वाला मानते हैं। काव्य, शब्द तथा अर्थमय है, अत: उसका अलंकरण भी शब्द तथा अर्थमूलक रहा है। कुछ अलंकार केवल शब्द-सौन्दर्य पर आधारित हैं और कुछ अर्थ-सौन्दर्य पर। शब्द पर आधारित अलंकार एक विशेष शब्द के प्रयोग पर निर्भर रहता है। उसका पर्यायवाची प्रयोग करने पर चमत्कार या शोभा समाप्त हो जाती है। अर्थमूलक अलंकार के प्रायः तीन प्रकार हैं –
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी अलंकारों को काव्य में प्रस्तुत भाव को उत्कर्ष देने वाला मानते हैं। काव्य, शब्द तथा अर्थमय है, अत: उसका अलंकरण भी शब्द तथा अर्थमूलक रहा है। कुछ अलंकार केवल शब्द-सौन्दर्य पर आधारित हैं और कुछ अर्थ-सौन्दर्य पर। शब्द पर आधारित अलंकार एक विशेष शब्द के प्रयोग पर निर्भर रहता है। उसका पर्यायवाची प्रयोग करने पर चमत्कार या शोभा समाप्त हो जाती है। अर्थमूलक अलंकार के प्रायः तीन प्रकार हैं –
1.
साम्यमूलक, जो दो
पदार्थों की समानता पर आधारित है
2.
विरोध मूलक, जिनमें
चमत्कारपूर्ण विरोध की कल्पना प्रस्तुत की जाती है और
3.
वक्रोक्तिमूलक, जिसमें कथन की वक्रता से शोभा उत्पन्न होती है।
इसी आधार पर शब्दालंकारों और अर्थालंकारों की स्वरूप-रचना की
गई है।
अलंकार के भेद – अलंकार द्वारा काव्य में चमत्कार का प्रदर्शन शब्द पर अथवा
अर्थ पर आधारित होता है। अत: अलंकारों के दो प्रमुख भेद हैं –
(1) शब्दालंकार तथा (2) अर्थालंकार। एक तीसरा अन्य भेद
उभयालंकार’ भी होता है।
शब्दालंकार – जहाँ चमत्कार कविता में प्रयुक्त शब्द पर आधारित होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। यदि प्रयुक्त शब्दों को हटाकर उनका
कोई पर्यायवाची रख दिया जाए, तो चमत्कार समाप्त हो जाता है।
इस प्रकार शब्द-विशेष पर आधारित होने के कारण ये शब्दालंकार कहे जाते हैं, जैसे –
“कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।”
इसे पंक्ति में ‘कनक’ शब्द का दो बार भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग करके चमत्कार
उत्पन्न किया गया है। यदि यहाँ कनक का पर्यायवाची ‘स्वर्ण’ शब्द रख दिया जाए तो चमत्कार समाप्त हो जाएगा। अत: चमत्कार
शब्द (कनक) पर आधारित होने के कारण इस पंक्ति में शब्दालंकार है।
अर्थालंकार – जहाँ कविता का चमत्कार या शोभा उसके अर्थ पर आधारित होती है, वहाँ अर्थालंकार होता है। वहाँ यदि प्रयुक्त शब्दों के स्थान
पर उनके पर्यायवाची भी रख दिए जाएँ तो भी चमत्कार यथावत् रहता है, जैसे
चली आ रही फेन उगलती फन फैलाए व्यालों-सी
इस पंक्ति को यदि इस प्रकार कहें
इस पंक्ति को यदि इस प्रकार कहें
“उमड़ रही थीं फेन उगलती फन फैलाए सर्पो-सी
तो भी चमत्कार या शोभा वैसी ही रहती है। अत: यहाँ अर्थालंकार है।
तो भी चमत्कार या शोभा वैसी ही रहती है। अत: यहाँ अर्थालंकार है।
उभयालंकार – जो शब्द एवं अर्थ दोनों में चमत्कार पैदा करके काव्य की शोभा
बढ़ाते हैं,
वे उभयालंकार होते हैं। इन्हें
मिश्रित संज्ञा भी दी गई है, जैसे-संसृष्टि और संकर।
शब्दालंकार
1.अनुप्रास अलंकार लक्षण
या परिभाषा – जहाँ काव्य-पंक्ति में वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार हो, चाहे उसमें स्वरों की समानता हो या विषमता, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण (1) ‘भगवान! भक्तों की भयंकर भूरि भीति भगाइये।’
उपर्युक्त काव्य-पंक्ति में ‘भ’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है।
उपर्युक्त काव्य-पंक्ति में ‘भ’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है।
उदाहरण (2 ‘तरनि
तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये।’
उपर्युक्त काव्य पंक्ति में ‘त’ वर्ण की आवृत्ति पाँच बार हुई है।
उपर्युक्त काव्य पंक्ति में ‘त’ वर्ण की आवृत्ति पाँच बार हुई है।
अनुप्रास के भेद – अनुप्रास अलंकार के निम्नलिखित भेद हैं –
(1) छेकानुप्रास – अनुप्रास के इस भेद में एक या एक से अधिक वर्णों की आवृत्ति केवल एक बार ही होती है, जैसे-‘कानन कठिन भयंकर भारी।’ इस काव्य पंक्ति में ‘क’ वर्ण तथा ‘भ’ वर्ण केवल दो-दो बार आए हैं, अतः यहाँ छेकानुप्रास अलंकार है।
(2) वृत्यानुप्रास – जहाँ एक या अनेक वर्णों की एक से अधिक बार आवृत्ति हो, वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार होता है, जैसे-‘विरति विवेक विमल विज्ञानी।’ इस काव्य पंक्ति में ‘व’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है, अत: यहाँ वृत्यानुप्रास है।
(3) श्रुत्यानुप्रास – जहाँ ऐसे वर्णों की आवृत्ति हो, जो मुख के एक ही उच्चारण-स्थान से उच्चरित हों, वहाँ श्रुत्यानुप्रास होता है, जैसे-‘दिनान्त था, थे दिननाथ डूबते।’ इस काव्य पंक्ति में एक ही उच्चारण-स्थान ‘दन्त’ से उच्चरित होने वाले अनेक
वर्षों ‘त, थ, द, न’ की आवृत्ति हुई है, अत: यहाँ श्रुत्यानुप्रास है।
(4) अन्त्यानुप्रास – छन्द के चरणों के अन्त में जहाँ एक समान वर्णों का प्रयोग हो, वहाँ अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है, जैसे
‘काली काली अलकों में,
आलस-मद-नत पलकों में।’
‘काली काली अलकों में,
आलस-मद-नत पलकों में।’
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों के अन्तम वर्ण एक समान हैं। अत:
इन तुकान्त (एक जैसी तुक वाली) पंक्तियों में अन्त्यानुप्रास है।
(5) लाटानुप्रास अलंकार में शब्दों या
वाक्यांशों की आवृत्ति होती है
और उनके अर्थ में भी कोई अन्तर नहीं होता, किन्तु अन्वय-भेद से अथवा वर्ण भेद से अर्थ (तात्पर्य) बदल जाता है, जैसे –
‘पराधीन जो जन, नहीं स्वर्ग-नरक ता हेतु।
पराधीन जो जन नहीं, स्वर्ण-नरक ता हेत्।’
पराधीन जो जन नहीं, स्वर्ण-नरक ता हेत्।’
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में वाक्यांश ज्यों के त्यों
दुहराए गए हैं और उनके अर्थ भी एक समान हैं, किन्तु अल्पविराम का स्थान
बदलकर अन्वय करने पर दोनों पंक्तियों का अर्थ बदल जाता है। अत: यहाँ लाटानुप्रास
अलंकार है।
2. श्लेष अलंकार लक्षण
या परिभाषा – काव्य में
जहाँ एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ प्रकट होकर चमत्कार की अनुभूति कराते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
उदाहरण (1) बलिहारी नृप कूप की, गुन बिन बूंद न देइ ।’
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में ‘गुन’ शब्द में श्लेष है। ‘गुन’ शब्द के यहाँ दो अर्थ ग्रहण किए गए हैं। नृप (राजा) के पक्ष में ‘गुन’ को अर्थ है-गुण या विशिष्टता तथा कूप (कुएँ) के पक्ष में ‘गुन’ का अर्थ है-रस्सी । अत: यहाँ श्लेष अलंकार है।
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में ‘गुन’ शब्द में श्लेष है। ‘गुन’ शब्द के यहाँ दो अर्थ ग्रहण किए गए हैं। नृप (राजा) के पक्ष में ‘गुन’ को अर्थ है-गुण या विशिष्टता तथा कूप (कुएँ) के पक्ष में ‘गुन’ का अर्थ है-रस्सी । अत: यहाँ श्लेष अलंकार है।
उदाहरण (2) ‘पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुस, चून।’
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में ‘पानी’ शब्द के विभिन्न सन्दर्भो में भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। मोती के सन्दर्भ में ‘पानी’ का अर्थ ‘चमक’ है, मनुष्य के सन्दर्भ में ‘पानी’ अर्थ ‘प्रतिष्ठा’ है व चून के सन्दर्भ में ‘पानी’ का अर्थ ‘जल’ है, अत: यहाँ श्लेष अलंकार है।
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में ‘पानी’ शब्द के विभिन्न सन्दर्भो में भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। मोती के सन्दर्भ में ‘पानी’ का अर्थ ‘चमक’ है, मनुष्य के सन्दर्भ में ‘पानी’ अर्थ ‘प्रतिष्ठा’ है व चून के सन्दर्भ में ‘पानी’ का अर्थ ‘जल’ है, अत: यहाँ श्लेष अलंकार है।
श्लेष अलंकार के भेद – श्लेष अलंकार के दो भेद माने गए हैं – (i) अभंग पद श्लेष तथा (ii) सभंग पद श्लेष। जब शब्द के विभिन्न अर्थ शब्द के टुकड़े किए बिना ही स्पष्ट हो
जाते हैं,
तो अभंग पद श्लेष अलंकार माना जाता है, जैसे-‘पानी गये न ऊबरै’ पंक्ति में भी ‘पानी’ शब्द के टुकड़े किये बिना ही
उसके तीनों अर्थ स्पष्ट हो जाते हैं। किन्तु, जहाँ विभिन्न अर्थों की प्राप्ति हेतु शब्द के टुकड़े करने पड़े, वहाँ सभंग पद श्लेष अलंकार माना जाता है, जैसे
“चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर ।।’
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर ।।’
उपर्युक्त दोहे में ‘वृषभानुजा’ शब्द के दोनों अर्थों की प्राप्ति इस शब्द के टुकड़े करने पर
ही होती है –
‘वृषभानु + जा’ (वृषभानु की पुत्री-राधा) तथा ‘वृषभ
+ अनुजा (बैल की बहन-गाय)। अतः यहाँ सभंग पद श्लेष है।
3. यमक अलंकार लक्षण
या परिभाषा – जहाँ एक या एक से अधिक शब्दों की आवृत्ति हो, किन्तु उनके अर्थ भिन्न-भिन्न हों, वहाँ यमक अलंकार होता है।
उदाहरण (1) ‘काली घटा का घमण्ड घटा, नभ-मण्डल तारक-वृन्द लिखे।’
‘घटा’ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है, किन्तु प्रथम ‘घटा’ शब्द का अर्थ ‘बादल की घटा’ है जबकि द्वितीय ‘घटा’ शब्द का अर्थ ‘कम होना’ है। अत: यहाँ यमक अलंकार का प्रयोग है।
‘घटा’ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है, किन्तु प्रथम ‘घटा’ शब्द का अर्थ ‘बादल की घटा’ है जबकि द्वितीय ‘घटा’ शब्द का अर्थ ‘कम होना’ है। अत: यहाँ यमक अलंकार का प्रयोग है।
उदाहरण (2) “कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय।।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय ।।”
उपर्युक्त दोहे में ‘कनक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है, किन्तु प्रथम ‘कनक’ शब्द का अर्थ ‘ धतूरा’ है तथा द्वितीय ‘कनक’ शब्द ‘स्वर्ण’ (सोने) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अत: यहाँ यमक अलंकार का प्रयोग है।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय ।।”
उपर्युक्त दोहे में ‘कनक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है, किन्तु प्रथम ‘कनक’ शब्द का अर्थ ‘ धतूरा’ है तथा द्वितीय ‘कनक’ शब्द ‘स्वर्ण’ (सोने) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अत: यहाँ यमक अलंकार का प्रयोग है।
उदारहण (3) ‘सुन्यौ कहूँ तरु अरक ते, अरक
समान उदोतु।’
उपर्युक्त काव्य पंक्ति में ‘अरक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है। यहाँ पहले ‘अरक’ शब्द का अर्थ ‘आक’ (पौधा) तथा दूसरे ‘अरक’ शब्द का अर्थ ‘सूर्य’ है, अत: इस पंक्ति में यमक अलंकार का सौन्दर्य है।
उपर्युक्त काव्य पंक्ति में ‘अरक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है। यहाँ पहले ‘अरक’ शब्द का अर्थ ‘आक’ (पौधा) तथा दूसरे ‘अरक’ शब्द का अर्थ ‘सूर्य’ है, अत: इस पंक्ति में यमक अलंकार का सौन्दर्य है।
उदाहरण (4) भजन कह्यौ ताते भज्यौ, भज्यौ न एको बार।
दूरि भजन जाते कह्यौ, सो ते भज्यो गॅवार।।
उपर्युक्त दोहे में ‘भजन’ और ‘ भज्यौ’ शब्दों की आवृत्ति हुई है।’ भजन’ शब्द के दो अर्थ हैं, पहले भजन का अर्थ भजन-पूजन और दूसरे भजन का अर्थ भाग जाना। इसी प्रकार पहले ‘भज्यौ’ का अर्थ भजन किया तथा दूसरे –‘भज्यौ’ का अर्थ भाग गया, इस प्रकार भजन एवं भज्यौ शब्दों की आवृत्ति ने दोहे में चमत्कार उत्पन्न कर दिया है। कवि अपने मन को संबोधित करते हुए कहता है-हे मेरे मन ! जिस परमात्मा का मैंने तुझे भजन करने को कहा, तू उससे भाग खड़ा हुआ और जिन विषय-वासनाओं से भाग जाने के लिए कहा, तू उन्हीं की आराधना करने लगा। इस प्रकार इन भिन्नार्थक शब्दों की आवृत्ति से दोहे में सौन्दर्य (यमक अलंकार है) उत्पन्न हो गया है।
दूरि भजन जाते कह्यौ, सो ते भज्यो गॅवार।।
उपर्युक्त दोहे में ‘भजन’ और ‘ भज्यौ’ शब्दों की आवृत्ति हुई है।’ भजन’ शब्द के दो अर्थ हैं, पहले भजन का अर्थ भजन-पूजन और दूसरे भजन का अर्थ भाग जाना। इसी प्रकार पहले ‘भज्यौ’ का अर्थ भजन किया तथा दूसरे –‘भज्यौ’ का अर्थ भाग गया, इस प्रकार भजन एवं भज्यौ शब्दों की आवृत्ति ने दोहे में चमत्कार उत्पन्न कर दिया है। कवि अपने मन को संबोधित करते हुए कहता है-हे मेरे मन ! जिस परमात्मा का मैंने तुझे भजन करने को कहा, तू उससे भाग खड़ा हुआ और जिन विषय-वासनाओं से भाग जाने के लिए कहा, तू उन्हीं की आराधना करने लगा। इस प्रकार इन भिन्नार्थक शब्दों की आवृत्ति से दोहे में सौन्दर्य (यमक अलंकार है) उत्पन्न हो गया है।
उदाहरण (5) तो पर वारौं उरबसी सुनि राधिके सुजान।
तू मोहन के उरबसी ह्वै उरबसी समान ।।
उपर्युक्त पंक्तियों में प्रथम ‘उरबसी’ उर्वशी अप्सरा, द्वितीय ‘उर + बसी’ क्रिया (हृदय में बसने वाली) तथा तृतीय आभूषण विशेष के अर्थ में प्रयुक्त है। अत: यहाँ ‘उरबसी’ शब्द के तीन भिन्न अर्थों में प्रयोग होने से यमक अलंकार है।
तू मोहन के उरबसी ह्वै उरबसी समान ।।
उपर्युक्त पंक्तियों में प्रथम ‘उरबसी’ उर्वशी अप्सरा, द्वितीय ‘उर + बसी’ क्रिया (हृदय में बसने वाली) तथा तृतीय आभूषण विशेष के अर्थ में प्रयुक्त है। अत: यहाँ ‘उरबसी’ शब्द के तीन भिन्न अर्थों में प्रयोग होने से यमक अलंकार है।
अर्थालंकार
4. उपमा अलंकार लक्षण या परिभाषा – ‘उपमा’ का सामान्य अर्थ है-किसी एक वस्तु
की किसी दूसरी वस्तु से तुलना करना।
अतः जहाँ किसी प्रस्तुत (वर्णित) वस्तु
की तुलना गुण, धर्म अथवा व्यापार (क्रिया) के आधार
पर अप्रस्तुत वस्तु से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
दूसरे शब्दों में, अत्यंत सादृश्य के कारण सर्वथा
भिन्न होते हुए भी जहाँ रूप, रंग, गुण आदि किसी धर्म के कारण किसी वस्तु की समानता किसी दूसरी
श्रेष्ठ या प्रसिद्ध वस्तु से दिखाई जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
उपमा के अंग – उपमा अलंकार के निम्नलिखित चार अंग होते हैं –
(1) उपमेय – जिस वस्तु का वर्णन किया जाता है, उसे अर्थात् वर्णित
या प्रस्तुत वस्तु को उपमेय कहते
हैं, जैसे-कमल सदृश कोमल हाथों ने’ काव्य
पंक्ति में ‘हाथों’ का वर्णन किया जा रहा है। अत:
यहाँ ‘हाथ’ उपमेय है। उपमेयं को प्रस्तुत’ या ‘वर्णित’ भी कहते हैं।
(2) उपमान – जिस अप्रस्तुत वस्तु से प्रस्तुत वस्तु अर्थात् उपमेय की समानता दिखाई जाती है, उसे उपमान कहते हैं, जैसे-‘कमल-सदृश कोमल हाथों ने’ काव्य पंक्ति में हाथों की समानता ‘कमल’ से दिखाई गयी है, अत: यहाँ ‘कमल’ उपमान है।
(3) साधारण धर्म – उपमेय तथा उपमान के जिस गुण की समानता दिखाई जाती है, उसे साधारण धर्म कहते हैं। इसे सामान्य या समान धर्म भी कहा जाता है, जैसे-कमल-सदृश कोमल हाथों ने’ काव्य पंक्ति में ‘कोमलता’ समान धर्म है।
(4) वाचक शब्द – समान गुण को व्यक्ति करने वाला शब्द ‘वाचक शब्द’ कहलाता है। वाचक शब्द द्वारा उपमेय तथा उपमान की समानता सूचित की जाती है, जैसे-कमल सदृश कोमल हथों ने’ काव्य पंक्ति में ‘सदृश’ वाचक शब्द है। जिन शब्दों की सहायता से उपमा अलंकार की पहचान होती है, वे हैं-सा, सी, तुल्य, सम, जैसा, ज्यों, सरिस, के समान आदि।
(2) उपमान – जिस अप्रस्तुत वस्तु से प्रस्तुत वस्तु अर्थात् उपमेय की समानता दिखाई जाती है, उसे उपमान कहते हैं, जैसे-‘कमल-सदृश कोमल हाथों ने’ काव्य पंक्ति में हाथों की समानता ‘कमल’ से दिखाई गयी है, अत: यहाँ ‘कमल’ उपमान है।
(3) साधारण धर्म – उपमेय तथा उपमान के जिस गुण की समानता दिखाई जाती है, उसे साधारण धर्म कहते हैं। इसे सामान्य या समान धर्म भी कहा जाता है, जैसे-कमल-सदृश कोमल हाथों ने’ काव्य पंक्ति में ‘कोमलता’ समान धर्म है।
(4) वाचक शब्द – समान गुण को व्यक्ति करने वाला शब्द ‘वाचक शब्द’ कहलाता है। वाचक शब्द द्वारा उपमेय तथा उपमान की समानता सूचित की जाती है, जैसे-कमल सदृश कोमल हथों ने’ काव्य पंक्ति में ‘सदृश’ वाचक शब्द है। जिन शब्दों की सहायता से उपमा अलंकार की पहचान होती है, वे हैं-सा, सी, तुल्य, सम, जैसा, ज्यों, सरिस, के समान आदि।
उदाहरण (1) ‘हरि सा हीरा छाँड़ि है, करै और की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रैदास ।।’
उपर्युक्त दोहे में प्रस्तुत ‘हरि’ की समानता अप्रस्तुत ‘हीरा’ से की गयी है। अत: यहाँ उपमा अलंकार है। उपमा अलंकार के चारों अंग यहाँ विद्यमान हैं। ‘हरि’ उपमान है। (क्योंकि हरि की उपमा हीरा से दी गयी है), ‘दुर्लभता’ समान या साधारण धर्म है तथा ‘सा’ वाचक शब्द है।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रैदास ।।’
उपर्युक्त दोहे में प्रस्तुत ‘हरि’ की समानता अप्रस्तुत ‘हीरा’ से की गयी है। अत: यहाँ उपमा अलंकार है। उपमा अलंकार के चारों अंग यहाँ विद्यमान हैं। ‘हरि’ उपमान है। (क्योंकि हरि की उपमा हीरा से दी गयी है), ‘दुर्लभता’ समान या साधारण धर्म है तथा ‘सा’ वाचक शब्द है।
उपमा के भेद – उपमा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद हैं –
(1) पूर्णोपमा – जिस उपमा में उसके चारों अंग (उपमेय, उपमान, साधारण धर्म तथा वाचक शब्द) विद्यमान हों, वह पूर्णोपमा कहलाती है, जैसे-‘दोनों बाँहें कलभकर-सी, शक्ति की पेटिका हैं।’ प्रस्तुत काव्य पंक्ति में उपमा के चारों अंग उपमेय (दोनों
बाँहें), उपमान (कलभ-कर), साधारण, धर्म, (शक्ति की पेटिका) तथा वाचक शब्द
(सी) उपस्थित हैं। अत: यहाँ पूर्णोपमा अलंकार है।
इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण देखिए –
‘प्रातः नभ था बहुत नीला शंख जैसे’-प्रस्तुत पंक्ति में प्रात:कालीन नभ उपमेय है, शंख उपमान है, नीला साधारण धर्म है और जैसे
वाचक शब्द है। यहाँ उपमा के चारों अंग उपस्थित हैं, अत:
यहाँ पूर्णोपमा अलंकार है।
(2) लुप्तोपमा – जिस उपमा में उसके चारों अंगों में से एक या एक से अधिक अंक
अनुपस्थित हों, वह लुप्तोपमा कहलाती है, जैसे-‘कमल-सदृश कोमल हाथों ने, झुका
दिया धनु वज्र कठोर।’
प्रस्तुत प्रथम आधी पंक्ति में पूर्णोपमा है, क्योंकि यहाँ उपमा के चारों अंगों का उल्लेख है। किन्तु
दूसरी आधी पंक्ति में उपमेय (धनु), उपमान (वज्र) तथा साधारण धर्म
(कठोर) का ही उल्लेख है। यहाँ वाचक शब्द अनुपस्थित है, अत: लुप्तोपमा अलंकार है।
इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण देखिए –
‘मखमल के झूले पड़े हाथी-सा टीला’।
‘मखमल के झूले पड़े हाथी-सा टीला’।
उपर्युक्त काव्यपंक्ति में टीला उपमेय है, मखमल के झूले पड़े हाथी उपमान है, सा वाचक शब्द है किन्तु इसमें साधारण धर्म नहीं है। वह छिपा
हुआ है। कवि का आशय है-‘मखमल के झूले पड़े ‘विशाल’ हाथी-सा टोला।’ यहाँ ‘विशाल’ जैसा कोई साधारण धर्म लुप्त है, अत: यहाँ लुप्तोपमा अलंकार है।
(3) मालोपमा – जिस उपमा में एक ही उपमेय के अनेक उपमान उपस्थित हों, वह मालोपमा कहलाती
है, जैसे-‘माँ शारदा तुषार, कुन्द, हीरे के सदृश धवल हैं।
प्रस्तुत पंक्ति में एक ही उपमेय शारदा (सरस्वती) की समानता
कुन्द, तुषार एवं हीरे (तीन-तीन उपमानों) द्वारा दिखायी गयी है, अत: यहाँ मालोपमा अलंकार है।
5. रूपक अलंकार लक्षण यो परिभाषा – जहाँ उपमेय और
उपमान में एकरूपता दिखाकर दोनों में अभेद स्थापित कर दिया जाता है वहाँ रूपक अलंकार होता है। यद्यपि रूपक में उपमेय एवं उपमान
दोनों ही उपस्थित होते हैं, किन्तु अत्यधिक सादृश्य के कारण
दोनों एक दिखाई पड़ते हैं। तात्पर्य यह है कि रूपक में प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) पर
अप्रस्तुत वस्तु (उपमान) को आरोपित कर दिया जाता है। इस प्रकार
उपमेय और उपमान में अभेद स्थापित हो जाता है।
उदाहरण (1) ‘अम्बर-पनघट में डुबो रही, तारा-घट
उषा-नागरी।’
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में उपमेय ‘अम्बर’ में उपमान’ पनघट’ का, उपमेय ‘तारा’ में उपमान’घट’ का तथा उपमेय’उषा’ में उपमान ‘नागरी’ का भेद-रहित आरोप है। अत: यहाँ रूपक अलंकार है।
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में उपमेय ‘अम्बर’ में उपमान’ पनघट’ का, उपमेय ‘तारा’ में उपमान’घट’ का तथा उपमेय’उषा’ में उपमान ‘नागरी’ का भेद-रहित आरोप है। अत: यहाँ रूपक अलंकार है।
उदाहरण (2) ‘शशि-मुख
पर पूँघट डाले अंचल में दीप छिपाये।’
यहाँ ‘मुख’ उपमेय में ‘शशि’ उपमान का अभेद आरोप होने से रूपक अलंकार का चमत्कार है।
यहाँ ‘मुख’ उपमेय में ‘शशि’ उपमान का अभेद आरोप होने से रूपक अलंकार का चमत्कार है।
उदाहरण (3) उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुवर बाल-पतंग।
विकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन-शृंग।।
उपर्युक्त दोहे में उदयगिरि पर ‘मंच’ का, रघुवर पर ‘बाल-पतंग’ (सूर्य) का, संतों पर ‘सरोज’ का एवं लोचनों पर ‘भृगों’ (भौंरों) का अभेद आरोप होने से रूपक अलंकार है।
विकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन-शृंग।।
उपर्युक्त दोहे में उदयगिरि पर ‘मंच’ का, रघुवर पर ‘बाल-पतंग’ (सूर्य) का, संतों पर ‘सरोज’ का एवं लोचनों पर ‘भृगों’ (भौंरों) का अभेद आरोप होने से रूपक अलंकार है।
6. उत्प्रेक्षा अलंकार लक्षण या परिभाषा – जहाँ उपमेय में किसी उपमान की सम्भावना व्यक्त की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता
है। यद्यपि दोनों (उपमेय एवं उपमान) में भिन्नता होती है, तथापि समान धर्म होने के कारण ऐसी सम्भावना व्यक्त की जाती
है।
सम्भावना व्यक्त करने के लिए ‘मानो’, ‘मनु’, ‘मनहुँ’, जनहुँ’, ‘जानो’, ‘ज्यों, ‘मनो’, ‘यथा’, ‘जनु’ आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया
जाता है।
उदाहरण (1) उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने उसका लगा।
मानो हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।’
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में उपमेय’क्रोध’ में उपमान ‘हवा के वेग’ की तथा उपमेय’तनु’ में उपमान ‘सागर’ की सम्भावना व्यक्त की गई है, अत: उत्प्रेक्षा अलंकार है
मानो हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।’
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में उपमेय’क्रोध’ में उपमान ‘हवा के वेग’ की तथा उपमेय’तनु’ में उपमान ‘सागर’ की सम्भावना व्यक्त की गई है, अत: उत्प्रेक्षा अलंकार है
उदाहरण (2) सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात।
मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप पर्यौ प्रभात।।
उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों में श्रीकृष्ण के सुन्दर श्याम शरीर में नीलमणि पर्वत की और उनके शरीर पर शोभायमान पीतांबर में प्रभात की धूप की मनोरम कल्पना की गई है।
मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप पर्यौ प्रभात।।
उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों में श्रीकृष्ण के सुन्दर श्याम शरीर में नीलमणि पर्वत की और उनके शरीर पर शोभायमान पीतांबर में प्रभात की धूप की मनोरम कल्पना की गई है।
उत्प्रेक्षा के भेद – उत्प्रेक्षा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद हैं
(1) वस्तूत्प्रेक्षा – जहाँ उपमेय वस्तु में उपमान वस्तु की सम्भावना की जाती है, अर्थात् एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लिया जाता है, वहाँ वस्तूत्प्रेक्षा
होती है, जैसे –
‘प्राणप्रिया मुख जगमगै, नीले अंचल चीर।
मनहुँ कलानिधि झलमले, कालिन्दी के नीर।।
मनहुँ कलानिधि झलमले, कालिन्दी के नीर।।
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में मुख’ में ‘कलानिधि’ की तथा ‘नीले अंचल चीर’ में ‘कालिन्दी के नीर’ की सम्भावना की गयी है, अतः यहाँ वस्तूत्प्रेक्षा है।
(2) हेतूत्प्रेक्षा – जहाँ अहेतु में हेतु की सम्भावना की जाए, अर्थात् अकारण को कारण मान लिया जाए, वहाँ हेतूत्प्रेक्षा
होती है, जैसे-‘मनहुँ कठिन आँगन चली ताते राते
पाँय।
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में कवि ने नायिका के पैरों के लाल होने का कारण कठिन आँगन पर चलना माना है, जो कि वास्तविक नहीं है। सुकुमार स्त्रियों के चरण (पैर) तो स्वाभाविक रूप से ही लाल होते हैं। अत: यहाँ अहेतु में हेतु की सम्भावना के कारण हेतूत्प्रेक्षा है।
प्रस्तुत काव्य पंक्ति में कवि ने नायिका के पैरों के लाल होने का कारण कठिन आँगन पर चलना माना है, जो कि वास्तविक नहीं है। सुकुमार स्त्रियों के चरण (पैर) तो स्वाभाविक रूप से ही लाल होते हैं। अत: यहाँ अहेतु में हेतु की सम्भावना के कारण हेतूत्प्रेक्षा है।
(3) फलोत्प्रेक्षा – जहाँ अफल में फल की सम्भावना की जाती है, अर्थात् जो फल या उद्देश्य नहीं होता, उसे ही फल या उद्देश्य मान लिया जाता है, वहाँ फलोत्प्रेक्षा
होती है, जैसे –
नित्य ही नहाती क्षीरसिन्धु में कलाधर है, सुन्दर तवानन की समता की इच्छा से।’
यहाँ कलाधर (चन्द्रमा) द्वारा क्षीरसिन्धु में स्नान करने का उद्देश्य, प्रयोजन या फल नायिका के मुख की समानता प्राप्त करना माना गया है, जबकि चन्द्रमा के क्षीरसागर में नहाने का प्रयोजन यह है कि चन्द्रमा की उत्पत्ति ही क्षीरसागर से हुई है। अत: यहाँ अफल में फल की सम्भावना के कारण फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।
नित्य ही नहाती क्षीरसिन्धु में कलाधर है, सुन्दर तवानन की समता की इच्छा से।’
यहाँ कलाधर (चन्द्रमा) द्वारा क्षीरसिन्धु में स्नान करने का उद्देश्य, प्रयोजन या फल नायिका के मुख की समानता प्राप्त करना माना गया है, जबकि चन्द्रमा के क्षीरसागर में नहाने का प्रयोजन यह है कि चन्द्रमा की उत्पत्ति ही क्षीरसागर से हुई है। अत: यहाँ अफल में फल की सम्भावना के कारण फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।
7. उदाहरण अलंकारजहाँ
एक बात कहकर उसके उदाहरण के रूप में दूसरी
बात कही जाए और दोनों को उपमावाचक शब्द-‘जैसे’, ‘ज्यों’, ‘मिस’ आदि से जोड़ दिया जाए, वहाँ उदाहरण अलंकार होता है।
जैसे –
नीकी पै फीकी लगै, बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत युद्ध में, रस श्रृंगार न सुहात।।
जैसे बरनत युद्ध में, रस श्रृंगार न सुहात।।
प्रस्तुत पद में ‘ अच्छी बात को भी बिना अवसर के
फीका लगना’ की पुष्टियुद्ध में श्रृंगार रस’ की बात कहकर की गई है तथा दोनों को ‘जैसे’ उपमा वाचक शब्द से जोड़ दिया
गया है। अत: उदाहरण अलंकार है।
उदाहरण (1) जो पावै अति उच्च पद, ताको पतन निदान।
ज्यों तपि-तपि मध्याहन लौं, असत होत है भान।।
प्रस्तुत काव्य – पंक्तियों में उच्च पद पर पहुँचकर नीचे आने के सामान्य कथन की पुष्टि सूर्य के मध्याह्न में तपने तथा सायंकाल अस्त होने से की गई है। दोनों को ‘ज्यों’ उपमावाचक शब्द से जोड़ दिया गया है।
ज्यों तपि-तपि मध्याहन लौं, असत होत है भान।।
प्रस्तुत काव्य – पंक्तियों में उच्च पद पर पहुँचकर नीचे आने के सामान्य कथन की पुष्टि सूर्य के मध्याह्न में तपने तथा सायंकाल अस्त होने से की गई है। दोनों को ‘ज्यों’ उपमावाचक शब्द से जोड़ दिया गया है।
8. विरोधाभास अलंकारजहाँ पर विरोध न होने
पर भी विरोध की प्रतीति होती है, अर्थात् कवि शब्दार्थ की योजना इस प्रकार करता है कि सुनते
ही पदार्थों में विरोध प्रतीत होने लगता है, किन्तु अर्थ स्पष्ट होते ही
विरोध शांत हो जाता है, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।
जैसे
उदाहरण (1) “मीठी लगै अँखियान लुनाई।”
आशय यह है कि आँखों का लावण्य मीठा प्रतीत होता है। लुनाई का शब्दार्थ है- लवणयुक्त अर्थात् खारा। खरापन यहाँ मीठा लग रहा है, यह विरोध-कथन है, परन्तु लुनाई का तात्पर्य यहाँ पर सुन्दरता के रूप में प्रकट होने से विरोध समाप्त हो गया है।
आशय यह है कि आँखों का लावण्य मीठा प्रतीत होता है। लुनाई का शब्दार्थ है- लवणयुक्त अर्थात् खारा। खरापन यहाँ मीठा लग रहा है, यह विरोध-कथन है, परन्तु लुनाई का तात्पर्य यहाँ पर सुन्दरता के रूप में प्रकट होने से विरोध समाप्त हो गया है।
उदाहरण (2) विसमय यह गोदावरी, अमृतन के फल देते।
केसव जीवन हार को, असेस दुख हर लेत।।
केसव जीवन हार को, असेस दुख हर लेत।।
प्रस्तुत पंक्तियों में गोदावरी को विसमय बताया गया है, जो विरोध प्रकट करता है। परन्तु विस का अर्थ ‘जल’ प्रकट होने पर विरोध समाप्त हो
जाता है। अत: विरोधाभास अलंकार है।
प्रश्न 10.निम्नलिखित काव्यांशों में
प्रयुक्त अलंकारों के नाम बताइए –
(क) निकल रही थी कर्म वेदना करुणा विकल कहानी-सी।- उपमा अलंकार
(ख) चरण कमल बंद हरिराई।- रूपक अलंकार
(ग) ताड़ वृक्ष मानो छूने चला अम्बर तल को।- उत्प्रेक्षा अलंकार
(घ) नील कमल सी आँखें उसकी जाने क्या-क्या कह गईं।- उपमा अलंकार
(ङ) मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों।- रूपक अलंकार
(च) पाकर प्रथम प्रेमभरी पाती प्यारी प्रियतम की।- अनुप्रास अलंकार।
(ख) चरण कमल बंद हरिराई।- रूपक अलंकार
(ग) ताड़ वृक्ष मानो छूने चला अम्बर तल को।- उत्प्रेक्षा अलंकार
(घ) नील कमल सी आँखें उसकी जाने क्या-क्या कह गईं।- उपमा अलंकार
(ङ) मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों।- रूपक अलंकार
(च) पाकर प्रथम प्रेमभरी पाती प्यारी प्रियतम की।- अनुप्रास अलंकार।
पारिभाषिक शब्दावली
‘Manuscript’ शब्द का अर्थ है –पाण्डुलिपि
‘तदर्थ’ शब्द का द्योतक है –Adhoc
“Treasury’ का रूपान्तर है –कोष
Scrutiny’ से आश्य है –संवीक्षा
परिवीक्षा – Probation रूपरेखा- Outline सत्यापन- Verification
Option - विकल्प Context- संदर्भ Copyright- स्वत्वाधिकार
Option - विकल्प Context- संदर्भ Copyright- स्वत्वाधिकार
Postpone- स्थगित करना Motion- प्रस्ताव Document- दस्तावेज
Catalogue- सूची Circular- परिपत्र अचार-संहिता- Code of Conduct
पिछला बकाया- Backlog नीलामी- Auction निविदा- Tender
रचना निबन्ध
परिभाषा – निबन्ध गद्य-साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है। निबन्ध को
गद्य की कसौटी माना जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत है-“यदि पद्य कवियों की कसौटी है तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।
भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबन्ध में ही सबसे अधिक संभव होता है।” रामचन्द्र वर्मा ने, गद्य में लिखित प्रबन्ध ‘साहित्यिक रोचक गुंफन’ लेख को निबन्ध माना
निबन्ध शब्द का अर्थ है – विचारों को बाँधना या गुँथना। नि + बंध से बने निबन्ध शब्द
का अर्थ ही विचारों को आकर्षक और क्रमबद्ध तरीके से बाँधना है। निबन्ध फ्रांसीसी
भाषा के ‘ऐसाई’ तथा अंग्रेजी भाषा के ‘ऐसे’ का पर्याय है। अंग्रेजी साहित्य
के प्रसिद्ध निबन्धकार जानसन ने कहा है- “निबन्ध मन का आकस्मिक और
उच्छृखल आवेग,
असम्बद्ध और चिन्तनहीन बुद्धि विलास
मात्र है।”
निबन्ध में भावतत्त्वे का होना अनिवार्य है – बाबू गुलाबराय के अनुसार, “निबन्ध
उस गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या
प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक संगति और सम्बद्धता के साथ किया
गया हो।”
विषय तथा आवश्यक तत्त्व – निबन्ध का विषय कुछ भी हो सकता है। किसी छोटी-से-छोटी वस्तु
के सम्बन्ध में भी निबन्ध लिखा जा सकता है। निबन्ध के लिए तीन बातें आवश्यक हैं –
1.
वैचारिक अनुभूतियों से सम्बन्धित विचारों को प्रतिपादन।
2.
पाठक के मन-मस्तिष्क को गुदगुदाने की क्षमता।
3.
साहित्यिक गुणों से युक्त शैली।
रचना की दृष्टि से निबन्ध के भेद-रचना की दृष्टि से निबन्ध
के निम्नलिखित भेद हैं-
1.
वर्णनात्मक निबन्ध
2.
विवरणात्मक निबन्ध
3.
भावात्मक निबन्ध
4.
विचारात्मक निबन्ध
5.
संस्मरणात्मक निबन्ध
6.
ललित निबन्ध।
निबन्ध लिखते समय तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए
(क) आरम्भ – आकर्षक, प्रभावोत्पादक और सरस होना चाहिए। निबन्ध का प्रारम्भ किया
जाना चाहिए –
1.
विषय से सम्बन्धित किसी कवि या विद्वान् की कविता अथवा सूक्ति से
2.
विषय की परिभाषा से
3.
उसकी आवश्यकता या महत्ता प्रदर्शित करते हुए अथवा
4.
उसकी वर्तमान अवस्था का दिग्दर्शन कराते हुए।
(ख) मध्य – यह निबन्ध का मुख्य और
महत्त्वपूर्ण भाग है। इसी में लेखक की योग्यता, कल्पना-शक्ति, अध्ययनशीलता, अनुभव क्षेत्र, विचार-शक्ति आदि का मूल्यांकन होता है। अत: रूपरेखा के
अनुसार छोटे-छोटे वाक्यों एवं अनुच्छेदों में बाँटकर रोचक ढंग से मध्य भाग को
प्रस्तुत करें।
(ग) अन्त – इसे उपसंहार भी कहते हैं। इसमें पूरे निबन्ध का निष्कर्ष या
निचोड़ आ जाना चाहिए। इसमें सम्बन्धित विषय की उपलब्धियों और सम्भावनाओं पर भी
दृष्टिपात किया जा सकता है।
निबन्ध का आकार न बड़ा और न छोटा होना चाहिए। यदि आकार सम्बन्धी निर्देश हो तो उसी के अनुसार शब्द संख्या का ध्यान रखते हुए निबन्ध लिखना चाहिए।
निबन्ध का आकार न बड़ा और न छोटा होना चाहिए। यदि आकार सम्बन्धी निर्देश हो तो उसी के अनुसार शब्द संख्या का ध्यान रखते हुए निबन्ध लिखना चाहिए।
निबन्ध की भाषा शुद्ध, भावानुकूल, प्रसंग, कहावतों और मुहावरों से युक्त
होनी चाहिए। वाक्य प्रसंगानुसार छोटे या बड़े, सुगठित, सुबोध एवं सरल होने चाहिए। जटिल वाक्य रचना से सदैव बचना
चाहिए।
(1) स्वच्छ भारत
: स्वस्थ भारत
अथवा
स्वच्छ भारत अभियान
अथवा
स्वच्छ भारत अभियान
संकेत बिन्दु-
1.
स्वच्छता क्या है?
2.
स्वच्छता के प्रकार
3.
स्वच्छता के लाभ
4.
स्वच्छता: हमारा योगदान
5.
उपसंहारे।
स्वच्छता क्या है? – निरंतर प्रयोग में आने पर या वातावरण के प्रभाव से वस्तु या
स्थान मलिन होता रहता है। धूल, पानी, धूप, कूड़ा-करकट की पर्त को साफ करना, धोना, मैल और गंदगी को हटाना ही
स्वच्छता कही जाती है। अपने शरीर, वस्त्रों, घरों, गलियों, नालियों, यहाँ तक कि अपने मोहल्लों और
नगरों को स्वच्छ रखना हम सभी का दायित्व है।
स्वच्छता के प्रकार – स्वच्छता को मोटे रूप में दो प्रकार से देखा जा सकता है-
व्यक्तिगत स्वच्छता और सार्वजनिक स्वच्छता । व्यक्तिगत स्वच्छता में अपने शरीर को
स्नान आदि से स्वच्छ बनाना, घरों में झाडू-पोंछा लगाना, स्नानगृह तथा शौचालय को विसंक्रामक पदार्थों द्वारा स्वच्छ
रखना। घर और घर के सामने से बहने वाली नालियों की सफाई, ये सभी व्यक्तिगत स्वच्छता के अंतर्गत आते हैं। सार्वजनिक
स्वच्छता में मोहल्ले और नगर की स्वच्छता आती है जो प्रायः नगर पालिकाओं और ग्राम
पंचायतों पर निर्भर रहती है। सार्वजनिक स्वच्छता भी व्यक्तिगत सहयोग के बिना पूर्ण
नहीं हो सकती।
स्वच्छता के लाभ – ‘कहा गया है कि स्वच्छता ईश्वर को भी प्रिय है।’ ईश्वर की कृपापात्र बनने की दृष्टि से ही नहीं अपितु अपने
मानव जीवन को सुखी, सुरक्षित और तनावमुक्त बनाए
रखने के लिए भी स्वच्छता आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। मलिनता या गंदगी न केवल
आँखों को बुरी लगती है, बल्कि इसका हमारे स्वास्थ्य से
भी सीधा संबंध है। गंदगी रोगों को जन्म देती है। प्रदूषण की जननी है और हमारी
असभ्यता की निशानी है। अत: व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखने में योगदान
करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
स्वच्छता के उपर्युक्त प्रत्यक्ष लाभों के अतिरिक्त इसके कुछ
अप्रत्यक्ष और दूरगामी लाभ भी हैं। सार्वजनिक स्वच्छता से व्यक्ति और शासन दोनों
लाभान्वित होते हैं। बीमारियों पर होने वाले खर्च में कमी आती है तथा स्वास्थ्य
सेवाओं पर व्यय होने वाले सरकारी खर्च में भी कमी आती है। इस बचत को अन्य सेवाओं
में उपयोग किया जा सकता है।
स्वच्छता : हमारा योगदान – स्वच्छता केवल प्रशासनिक उपायों के बलबूते नहीं चल सकती।
इसमें प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी परम आवश्यक होती है। हम अनेक प्रकार से
स्वच्छता से योगदान कर सकते हैं, जो निम्नलिखित हो सकते हैं –
घर का कूड़ा-करकट गली या सड़क पर न फेंकें। उसे सफाईकर्मी के
आने पर उसकी ठेल या वाहन में ही डालें। कूड़े-कचरे को नालियों में न बहाएँ। इससे
नालियाँ अवरुद्ध हो जाती हैं। गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है।
पालीथिन का बिल्कुल प्रयोग न करें। यह गंदगी बढ़ाने वाली
वस्तु तो है ही,
पशुओं के लिए भी बहुत घातक है। घरों
के शौचालयों की गंदगी नालियों में न बहाएँ। खुले में शौच न करें तथा बच्चों को
नालियों या गलियों में शौच न कराएँ। नगर पालिका के सफाईकर्मियों का सहयोग करें।
उपसंहार – प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान
चलाया है। इसका प्रचार-प्रसार मीडिया के माध्यम से निरंतर किया जा रहा है। अनेक जन
प्रतिनिधि, अधिकारी कर्मचारी, सेलेब्रिटीज (प्रसिद्ध लोग)
इसमें भाग ले रहे हैं। जनता को इसमें अपने स्तर से पूरा सहयोग देना चाहिए। इसके
साथ गाँवों में खुले में शौच करने की प्रथा को समाप्त करने के लिए लोगों को घरों
में शौचालय बनवाने के प्रेरित किया जा रहा है। उसके लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान
की जा रही है। इन अभियानों में समाज के प्रत्येक वर्ग को पूरा सहयोग करना चाहिए।
(2) डिजिटल
इंडिया
अथवा
भारत : डिजिटलीकरण की ओर
अथवा
भारत : डिजिटलीकरण की ओर
परिचय – ‘डिजिटल इंडिया’ भारतीय समाज को अंतर्राष्ट्रीय
रीति-नीतियों से कदम मिलाकर चलने की प्रेरणा देने वाला एक प्रशंसनीय और साहसिक
प्रयास है। यह भारत सरकार की एक नई पहल है। भारत के भावी स्वरूप को ध्यान में रखकर
की गई एक दूरदर्शितापूर्ण संकल्पना है।
उद्देश्य – इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य भारत को डिजिटल दृष्टि से सशक्त
समाज और ज्ञानाधारित अर्थव्यवस्था में बदलना है। इस संकल्प के अंतर्गत भारतीय
प्रतिभा को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़कर कल के भारत की रचना करना है। इस दृष्टि
से ‘डिजिटल इंडिया’ के तीन प्रमुख लक्ष्य निर्धारित
किए गए हैं –
1.
हर नागरिक के लिए एक उपयोगी डिजिटल ढाँचा तैयार करना।
2.
जनता की माँग पर आधारित डिजिटल सेवाओं का संचालन तथा उन्हें लोगों
को उपलब्ध कराना।
3.
लोगों को डिजिटल उपकरणों के प्रयोग में दक्षता प्रदान करना।
डिजिटल होने का अर्थ – आम आदमी के लिए डिजिटल बनने का आशय है कि नकद लेन-देन से
बचकर आनलाइन (मोबाइल, पेटीएम, डेविट कार्ड आदि) लेन-देन का प्रयोग करना, कागजी काम को कम से कम किया जाना। सरकारी तथा बैंकिंग
कार्यों में और व्यापारिक गतिविधियों में पारदर्शिता आना। ठगी और रिश्वत से बचाव
होना आदि हैं।
डिजिटल अभियान के लाभ – यह अभियान समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाने वाला है –
·
यह व्यवस्था गृहणियों को पारवारिक आय-व्यय, खरीददारी, मासिक और वार्षिक प्रबंधन आदि में
सहायक है।
·
छात्रों के लिए उपयुक्त विद्यालय के चयन, अध्ययन सामग्री की सहज उपलब्धता, छात्रवृत्ति आदि के लिए आन लाइन
प्रार्थना-पत्र भेजने में, पुस्तकों
के बोझ को कम करने में सहायक होगा।
·
बेरोजगार नौजवान उपयुक्त नौकरियों की तलाश सरलता से कर पाएँगे तथा
डिजिटल प्रार्थना-पत्रों के प्रयोग से पारदर्शी चयन प्रणाली का लाभ उठाएँगे।
आनलाइन प्रमाण पत्र जमा कर सकेंगे।
·
व्यापारी और उद्योगी भी इससे लाभान्वित होंगे, नकद लेन-देन के झंझट से बचाव होगा।
ग्राहक संतुष्ट रहेंगे। सरकारी कामों, आयकर, ट्रांसपोर्ट तथा व्यापार के विस्तार
में पारदर्शिता आएगी।
·
अभिलेखों की सुरक्षा, ई-हस्ताक्षर, मोबाइल बैंकिंग, सरकारी कामों में दलालों से मुक्ति, जमीन-जायदाद के क्रय-विक्रय में
पारदर्शिता, ई-पंजीकरण
आदि ‘डिजिटल
इंडिया’ के अनेक
लाभ हैं।
चुनौतियाँ – डिजिटल प्रणाली को लागू करने के अभियान में अनेक चुनौतियाँ
भी हैं। सबसे प्रमुख चुनौती है- जनता को इसके प्रति आश्वस्त करके इसमें भागीदार
बनाना। नगरवासियों को भले ही डिजिटल उपकरणों का प्रयोग आसान लगता हो, लेकिन करोड़ों ग्रामवासियों, अशिक्षितों
को इसके प्रयोग में सक्षम बनाना एक लम्बी और धैर्यशाली प्रक्रिया है। इसके
अतिरिक्त कर चोरी के प्रेमियों को यह प्रणाली रास नहीं आएगी। इलेक्ट्रानिक सुरक्षा
के प्रति लोगों में भरोसा जमाना होगा। साइबर अपराधों, हैकिंग और ठगों से जनता को सुरक्षा प्रदान करनी होगी।
आगे बढ़ें – चुनौतियाँ, शंकाएँ और बाधाएँ तो हर नए और
हितकारी काम में आती रही हैं। शासकीय ईमानदारी और जन-सहयोग से, इस प्रणाली को स्वीकार्य और सफल बनाना, देशहित की दृष्टि से बड़ा आवश्यक है। आशा है, हम सफल होंगे।
(3) खुला
शौच-मुक्त गाँव
संकेत बिन्दु –
1.
खुला शौच मुक्त से आशय
2.
सरकारी प्रयास
3.
जन-जागरण
4.
हमारा योगदान
5.
महत्व/उपसंहार
खुला शौच मुक्त से आशय – ‘खुला शौच मुक्त’ को सरल भाषा में कहें तो खुले
में शौच क्रिया से मुक्त होना इसका आशय है। ऐसा गाँव जहाँ लोग बाहर खेतों या
जंगलों में शौच के लिए न जाते हों, घरों में ही शौचालय हों, ‘खुला शौच मुक्त गाँव कहा जाता है। गाँवों में खुले में शौच
के लिए जाने की प्रथा शताब्दियों पुरानी है। जनसंख्या सीमित होने तथा सामाजिक
मर्यादाओं का सम्मान किए जाने के कारण इस परंपरा से कई लाभ जुड़े हुए थे। गाँव से
दूर शौच क्रिया किए जाने से ‘मैला ढोने के काम से मुक्ति तथा
स्वच्छता दोनों का साधन होता था। मल स्वत: विकरित होकर खेतों में खाद का काम करता
था। पर आज की परिस्थितियों में खुले में शौच, रोगों को खुला आमंत्रण बन गया
है। साथ ही इससे उत्पन्न महिलाओं की असुरक्षा ने इसे विकट समस्या बना दिया है। अत:
इस परंपरा का यथाशीघ्र समाधान, स्वच्छता, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा की दृष्टि से परम आवश्यक हो गया
है।
सरकारी प्रयास – कुछ वर्ष पहले तक इस दिशा में सरकारी प्रयास शून्य के बराबर
ही थे। गाँवों में कुछ सम्पन्न और सुरुचि युक्त परिवारों में ही घरों में शौचालय
का प्रबन्ध होता था वह भी केवल महिला सदस्यों के लिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
ने जब ग्रामीण महिलाओं और विशेषकर किशोरियों के साथ होने वाली लज्जाजनक घटनाओं पर
ध्यान दिया तो स्वच्छता अभियान के साथ खुला शौच मुक्त गाँव अभियान’ को भी जोड़ दिया। इस दिशा में सरकारी प्रयास निरंतर चल रहे
हैं।
घरों में शौचालय बनाने वालों को सरकार की ओर से आर्थिक
सहायता प्रदान की जा रही है। समाचार पत्रों तथा टी. वी. विज्ञापनों में प्रसिद्ध
व्यक्तियों द्वारा बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से घरों में शौचालय बनाने की प्रेरणा दी
जा रही है।
जन जागरण – किसी प्राचीन कुप्रथा से मुक्त होने में भारतीय ग्रामीण
समुदाय को बहुत हिचक होती है। उन पर सरकारी प्रयासों की अपेक्षा, अपने बीच के प्रभावशाली व्यक्तियों, धर्मचार्यों तथा मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं का प्रभाव अधिक
पड़ता है। अतः ‘खुले में शौच’ की समाप्ति के लिए जन जागरण परम
आवश्यक है। इसके लिए कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ भी प्रयास कर रही हैं। इसके साथ ही
धार्मिक आयोजन में प्रवक्ताओं द्वारा इस प्रथा के परिणाम की प्रेरणा दी जानी
चाहिए। शिक्षक,
छात्र-छात्राओं के द्वारा प्रदर्शन का
सहारा लेना चाहिए। गाँव के शिक्षित युवाओं को इस प्रयास में हाथ बँटाना चाहिए। ऐसे
जन जागरण के प्रयास मीडिया द्वारी तथा गाँव के सक्रिय किशोरों और युवाओं द्वारा
किए भी जा रहे हैं। खुले में शौच करते व्यक्ति को देखकर सीटी बजाना ऐसा ही रोचक
प्रयास है।
हमारा योगदान – ‘हमारा’ में छात्र-छात्रों, शिक्षक, राजनेता, व्यवसायी, जागरूक नागरिक आदि सभी लोग
सम्मिलित हैं। सभी के सामूहिक प्रयास से बुराई को समाप्त किया जा सकता है। ग्रामीण
जनता को खुले में शौच से होने वाली हानियों के बारे में समझाना चाहिए। उन्हें
बताया जाना चाहिए कि इससे रोग फैलते हैं और धन तथा समय की बरबादी होती है। साथ ही
यह एक अशोभनीय आदत है। यह महिलाओं के लिए अनेक समस्याएँ और संकट खड़े कर देता है।
घरों में छात्र-छात्राएँ अपने माता-पिता आदि को इससे छुटकारा पाने के लिए प्रेरित
करें।
उपसंहार – खुले में शौच मुक्त गाँवों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।
सरकारी प्रयासों के अतिरिक्त ग्राम-प्रधानों तथा स्थानीय प्रबुद्ध और प्रभावशाली
लोगों को आगे आकर इस अभियान में रुचि लेनी चाहिए। इससे न केवल ग्रामीण भारत को
रोगों, बीमारियों पर होने वाले व्यय से मुक्ति मिलेगी बल्कि
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि भी सुधेरगी।
(4) मेक इन
इंडिया
अथवा
भारत में औद्योगिक क्रांति
अथवा
भारत में औद्योगिक क्रांति
संकेत बिन्दु –
1.
भूमिका
2.
सम्पन्नता क्यों ?
3.
धनोपार्जन और उद्योग
4.
मेक इन इंडिया
5.
विदेशी पूँजी की जरूरत
6.
पूँजी के साथ तकनीक का आगमन
7.
उपसंहार।
भूमिका – वस्तुओं पर ‘‘मेड इन इंडिया’ की छाप देख हमारा मन गर्व से भर जाता है। यह देश में स्वदेशी
उद्योगों के निरंतर विकास का सूचक तो होता ही है साथ ही हर भारतीय को आत्मविश्वास
से भरने वाला भी होता है। किन्तु हमारे प्रधानमंत्री जी ने इसके साथ-साथ ‘मेक इन इंडिया’ नारा भी दिया है, जिसका आशय है विदेशी निवेशकों को भारत में उद्योग स्थापित
करने के लिए आमंत्रण देना। औद्योगिक प्रगति और संपन्नता की दृष्टि से यह एक नई सोच
है।
सम्पन्नता क्यों – प्रश्न उठता है कि मनुष्य सम्पन्न होना क्यों चाहता है ? हमारे जीवन में अनेक आवश्यकताएँ होती हैं। उनकी पूर्ति के लिए
साधन चाहिए। ये साधन हमको सम्पन्न होने पर ही प्राप्त होंगे। आवश्यकता की पूर्ति न
होने पर हम सुख से नहीं रह सकते। अतः धन कमाना और सम्पन्न होना आवश्यक है।
धनोपार्जन और उद्योग – धन कमाने के लिए कुछ करना होगा, कुछ पैदा भी करना होगा। कृषि और उद्योग उत्पादन के माध्यम
हैं। व्यापार भी इसका एक साधन है। हम कुछ पैदा करें, कुछ
वस्तुओं का उत्पादन करें यह जरूरी है। देश को आगे बढ़ाने और समृद्धिशाली बनाने के
लिए हमें अपनी आवश्यकता की ही नहीं, दूसरों की आवश्यकता की वस्तुएँ
भी बनानी होंगी।
मेक इन इंडिया – आजकल छोटे-छोटे देश अपने यहाँ उत्पादित वस्तुओं का विदेशों
में निर्यात करके अपनी समृद्धि को बढ़ा रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में नष्ट हुआ
जापान स्वदेशी के बल पर ही अपने पैरों पर खड़ा हो सका है। भारत के प्रधानमंत्री
मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया है। इसका उद्देश्य
विदेशी पूँजी को भारत में आकर्षित करना तथा उससे यहाँ उद्योगों की स्थापना करना
है। इन उद्योगों में बनी वस्तुएँ भारत में निर्मित होंगी। उनको विश्व के अन्य
देशों के बाजारों में बेचा जायेगा। इससे धन का प्रवाह भारत की ओर बढ़ेगा और वह एक
समृद्ध राष्ट्र बन सकेगा।
विदेशी पूँजी की जरूरत – उद्योगों की स्थापना तथा उत्पादन करने और उसकी वृद्धि करने
के लिए पूँजी की आवश्यकता होगी ही। अभी भारत के पास इतनी पूँजी नहीं हैं कि वह
अपने साधनों से बड़े-बड़े उद्योग स्थापित कर सके तथा उन्हें संचालित कर सके। हमारे
प्रधानमंत्री चाहते हैं कि विदेशों में रहने वाले सम्पन्न भारतीय तथा अन्य
उद्योगपति भारत आयें और यहाँ पर अपनी पूँजी से उद्योग लगायें। उत्पादित माल के लिए
उनको भारतीय बाजार तो प्राप्त होगा ही, वे विदेशी बाजारों में भी अपना
उत्पादन बेचकर मुनाफा कमा सकेंगे। उससे भारत के साथ ही उनको भी लाभ होगा।
पूँजी के साथ तकनीक का आगमन – प्रधानमंत्री जानते हैं कि भारत को पूँजी ही नहीं नवीन तकनीक
की भी आवश्यकता है। वह विदेशी उद्योगपतियों को भारत में उत्पादन के लिए आमंत्रित
करके पूँजी के साथ नवीन तकनीक की प्राप्ति के द्वार भी खोलना चाहते हैं । यह सोच उनकी
दूरदृष्टि को प्रकट करने वाली है। बच्चा चलना सीखता है, तो उसको किसी की उँगली पकड़ने की आवश्यकता होती है। फिर तो
वह सरपट दौड़ने लगता है। भारत भी कुशल उद्योगपतियों के अनुभव का लाभ उठाकर एक
शक्तिशाली औद्योगिक देश बन सकता है।
उपसंहार – ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता के लिए हमें अनेक
प्रबंध करने और कदम उठाने होंगे। देश में ऐसा औद्योगिक वातावरण बनाना होगा जिससे
विदेशी निवेशक यहाँ अपने उद्योग लगाने को प्रेरित हों । सड़क, बिजली, परिवहन के क्षेत्र में सुधार
करने होंगे। उद्योग स्थापना में कानूनी जटिलताएँ दूर हो और विभागीय अनुभूतियाँ
सरलता तथा शीघ्रता से प्राप्त हों, ऐसा प्रबन्ध करना होगा। भारत
सरकार इस दिशा में निरंतर समुचित कदम उठा रही है।
(5) बाल श्रम से
जूझता बचपन
अथवा
बाल श्रमिक और शोषण
अथवा
बाल श्रमिक और शोषण
संकेत बिंदु –
·
बाल श्रमिक कौन
·
बाल श्रमिक की दिनचर्या
·
गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण
·
सुधार हेतु सामाजिक एवं कानूनी प्रयास।
बाल श्रमिक कौन – 14 वर्ष से कम आयु के मजदूरी या उद्योगों में काम करने वाले
बालक आते हैं। खेलने-कूदने और पढ़ने की उम्र में मेहनत-मजदूरी की चक्की में पिसता
देश को बचपन समाज की सोच पर एक कलंक है। ढाल, कारखानों और घरों में अत्यन्त
दयनीय स्थितियों में काम करने वाले ये बाल-श्रमिक देश की तथाकथित प्रगति के गाल पर
एक तमाचा हैं। इनकी संख्या लाखों में है।
बाल श्रमिक की दिनचर्या – इन बाल श्रमिकों की दिनचर्या पूरी तरह इनके मालिकों या
नियोजकों पर निर्भर होती है। गर्मी हो, वर्षा या शीत इनको सबेरे जल्दी
उठकर काम पर जाना होता है। इनको भोजन साथ ले जाना पड़ता है या फिर मालिकों की दया
पर निर्भर रहना पड़ता है। इनके काम के घंटे नियत नहीं होते। बारह से चौदह घण्टे तक
भी काम करना पड़ता है। कुछ तो चौबीस घण्टे के बँधुआ मजदूर होते हैं। बीमारी या
किसी अन्य कारण से अनुपस्थित होने पर इनसे कठोर व्यवहार यहाँ तक कि निर्मम पिटाई
भी होती है।
गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण – घरों में या कारखानों में काम करने वाले इन बालकों का
तरह-तरह से शोषण होता है। इनको बहुत कम वेतन दिया जाता है। काम के घण्टे नियत नहीं
होते। बीमार होने या अन्य कारण से अनुपस्थित होने पर वेतन काट लिया जाता है। इनकी
कार्य-स्थल पर बड़ी दयनीय दशा होती है। सोने और खाने की कोई व्यवस्था नहीं होती
है। नंगी भूमि पर खुले आसमान या कहीं कौने में सोने को मजबूर होते हैं। रूखा-सूखा
या झूठन खाने को दी जाती है। बात-बात पर डाँट-फटकार, पिटाई, काम से निकाल देना तो रोज की कहानी है। यदि दुर्भाग्य से कोई
नुकसान हो गया तो पिटाई या वेतन काट लेना आदि साधारण बातें हैं। वयस्क मजदूरों की
तो यूनियनें हैं जिनके द्वारा वह अन्याय और अत्याचार का विरोध कर पाते हैं किन्तु
इन बेचारों की सुनने वाला कोई नहीं। केवल इतना ही नहीं मालिकों और दलालों द्वारा
इनका शारीरिक शोषण भी होता है।
सुधार हेतु सामाजिक एवं कानूनी प्रयास – बाल श्रमिकों की समस्या बहुत पुरानी है। इसके पीछे गरीबी के
साथ ही माँ बाप का लोभ और पारिवारिक परिस्थिति कारण होती है। इस समस्या से निपटने
के लिए सामाजिक और शासन के स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं। सामाजिक स्तर पर माँ-बाप को
बालकों को शिक्षित बनाने के लिए समझाया जाना आवश्यक है। इस दिशा में स्वयंसेवी
संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। सरकारी स्तर पर बाल श्रम रोकने को कठोर कानून
बनाए गए हैं। लेकिन उनका परिपालन भी सही ढंग से होना आवश्यक है। विद्यालयों में
पोषाहार एवं छात्रवृत्ति आदि की सुविध गएँ दिया जाना, बाल श्रमिकों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति में सुधार किया
जाना आदि प्रयासों से यह समस्या समाप्त हो सकती है।
(6) बेटी बचाओ :
बेटी पढ़ाओ
अथवा
कन्या भ्रूण हत्या : महापाप
अथवा
कन्या भ्रूण हत्या : महापाप
संकेत बिन्दु –
·
घोर पाप
·
कन्या-भ्रूण हत्या के कारण
·
कन्या भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम
·
कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उपाय।
घोर पाप – हमारी भारतीय संस्कृति में कन्या को देवी का स्वरूप माना
जाता है। नवरात्रि और देवी जागरण के समय कन्या-पूजन की परम्परा से सभी परिचित हैं।
हमारे धर्मग्रन्थ भी नारी की महिमा का गुणगान करते हैं। आज उसी भारत में कन्या को
माँ के गर्भ में ही समाप्त कर देने की लज्जाजनक परम्परा चल रही है। इस घोर पाप ने
सभ्य जगत के सामने हमारे मस्तक को झुका दिया है।
कन्या-भ्रूण हत्या के कारण – कन्या भ्रूण को समाप्त करा देने के पीछे अनेक कारण हैं। कुछ
राजवंशों और सामन्त परिवारों में विवाह के समय वर-पक्ष के सामने न झुकने के झूठे
अहंकार ने कन्याओं की बलि ली। पुत्री की अपेक्षा पुत्र को महत्व दिया जाना, धन लोलुपता, दहेज प्रथा तथा कन्या के
लालन-पालन और सुरक्षा में आ रही समस्याओं ने भी इस निन्दनीय कार्य को बढ़ावा दिया
है। दहेज लोभियों ने भी इस समस्या को विकट बना दिया हैं। झूठी शान के प्रदर्शन के
कारण कन्या का विवाह सामान्य परिवारों के लिए बोझ बन गया है।
कन्या-भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम – चिकित्सा विज्ञान को प्रगति के कारण आज गर्भ में ही संतान के
लिंग का पता लगाना सम्भव हो गया हैं। अल्ट्रासाउण्ड मशीन से पता लग जाता है कि गर्भ
में लड़की है या लडका यदि गर्भ में लड़की है, तो कुबुद्धि-लोग उसे डॉक्टरों
की सहायता से नष्ट करा देते हैं। इस निन्दनीय आचरण के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
देश के अनेक राज्यों में लड़कियों और लड़कों के अनुपात में चिन्ताजनक गिरावट आ गई
है। लड़कियों की कमी हो जाने से अनेक युवक कुँवारे घूम रहे हैं। अगर सभी लोग पुत्र
ही पुत्र चाहेंगे तो पुत्रियाँ कहाँ से आएँगी । विवाह कहाँ से होंगे ? वंश कैसे चलेंगे ? इस महापाप में नारियों का भी
सहमत होना बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है।
कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उपाय – कन्या-भ्रूण हत्या को रोकने के लिए जनता और सरकार ने लिंग
परीक्षण को अपराध घोषित करके कठोर दण्ड का प्रावधान किया है फिर भी चोरी छिपे यह
काम चल रहा है। इसमें डॉक्टरों तथा परिवारीजन दोनों का सहयोग रहता है। इस समस्या
का हल तभी सम्भव है जब लोगों में लड़कियों के लिए हीन भावना समाप्त हो। पुत्र और
पुत्री में कोई भेद नहीं किया जाय।
कन्या-भ्रूण हत्या भारतीय समाज के मस्तक पर कलंक है । इस
महापाप में किसी भी प्रकार को सहयोग करने वालों को समाज से बाहर कर दिया जाना
चाहिए और कठोर कानून बनाकर दण्डित किया जाना चाहिए कन्या भ्रूण हत्या मानवता के
विरुद्ध अपराध है।
बेटी बचाओ – बेटियाँ देश की सम्पत्ति हैं। उनको बचाना सभी भारतवासियों का
कर्तव्य है। वे बेटों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। परिवार तथा देश के उत्थान में
उनका योगदान बेटों से भी अधिक है। उसके लिए उनकी सुरक्षा के साथ ही उनको सुशिक्षित
बनाना भी जरूरी है। हमारे प्रधानमंत्री ने यह सोचकर ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया है।
(7) राष्ट्रीय
एकता की सुरक्षा- हमारा कर्तव्य
संकेत बिंदु –
·
राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय
·
राष्ट्रीय एकता-अखण्डता की आवश्यकता
·
राष्ट्रीय
·
एकता, अखण्डता
की सांस्कृतिक विरासत
·
राष्ट्रीय एकता की वर्तमान स्वरूप
·
राष्ट्रीय एकता और हमारा कर्तव्य
·
उपसंहार।
राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय – राष्ट्रीय एकता का अर्थ है- हमारी एक राष्ट्र के रूप में
पहचान । हम सर्वप्रथम भारतीय हैं इसके बाद हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख आदि हैं। अनेक विविधताओं और
भिन्नताओं के रहते हुए भी आन्तरिक एकता की भावना, देश
के सभी धर्मों,
परम्पराओं, आचार-विचारों, भाषाओं और उपसंस्कृतियों का आदर
करना, भारतभूमि और सभी भारतवासियों से हार्दिक लगाव बनाए रखना, यही राष्ट्रीय एकता का स्वरूप है । भारत एक विशाल-विस्तृत
सागर के समान हैं। जिस प्रकार अनेक नदियाँ बहकर सागर में जा मिलती हैं और उनकी
पृथकता मिट जाती है, उसी प्रकार विविध वर्गों, धर्मों, जातियों, विचारधाराओं के लोग भारतीयता की भावना से बँधकर एक हो जाते
हैं। जिस प्रकार अनेक पेड़-पौधे मिलकर एक वन प्रदेश का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार विविध मतावलम्बियों की एकता से ही भारत का
निर्माण हुआ है।
राष्ट्रीय एकता-अखण्डता आवश्यकता – भारत विविधताओं का देश है। यह एक संघ-राज्य है। अनेक राज्यों
या प्रदेशों का एकात्म स्वरूप है। यहाँ हर राज्य में भिन्न-भिन्न रूप, रंग, आचार, विचार, भाषा और धर्म के लोग निवास करते
हैं। इन प्रदेशों की स्थानीय संस्कृतियाँ और परम्पराएँ हैं। इन सभी से मिलकर हमारी
राष्ट्रीय या भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है । हम सब भारतीय हैं, यही भावना सारी विभिन्नताओं को बाँधने वाला सूत्र है। यही
हमारी राष्ट्रीय एकता का अर्थ और आधार है। विविधता में एकता भारत राष्ट्र की
प्रमुख विशेषता है। उसमें अनेक धर्मों और सांस्कृतिक विचारधाराओं का समन्वय है ।
भारतीयता के सूत्र में बँधकर ही हम दृढ़ एकता प्राप्त कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता
और अखण्डता के बिना भारत का भविष्य अंधकारमय है।
राष्ट्रीय एकता-अखण्डता सांस्कृतिक विरासत – राष्ट्रीय एकता और अखण्डता भारतीय संस्कृति की देन है। भारत
विभिन्न धर्मों,
विचारों और मतों को मानने वालों का
निवास रहा है। भारतीय संस्कृति इन विभिन्नताओं का समन्वित स्वरूप है। भारत की
भौगोलिक स्थिति ने भी इस सामाजिक संस्कृति के निर्माण में योगदान किया है। विभिन्न
आघात सहकर भी भारतीय एकता सुरक्षित रही है, इसका कारण उसका भारत की सामाजिक
संस्कृति से जन्मे होना ही है।
राष्ट्रीय एकता का वर्तमान स्वरूप – आज हमारी राष्ट्रीय एकता संकट में है। यह संकट बाहरी नहीं
आंतरिक है। हमारे राजनेता और शासकों ने अपने भ्रष्ट आचरण से देश की एकता को संकट
में डाल दिया है। अपने वोट-बैंक को बनाए रखने के प्रयास में इन्होंने भारतीय समाज
को जाति-धर्म,
आरक्षित-अनारक्षित, अगड़े-पिछडे, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक और
प्रादेशिक कट्टरता के आधार पर बाँट दिया है । इन बड़बोले, कायर और स्वार्थी लोगों ने राष्ट्रीय एकता को संकट में डाल
दिया है।
राष्ट्रीय एकता और हमारा कर्तव्य – राष्ट्रीय एकता पर हो रहे इन प्रहारों ने राष्ट्र के रूप में
भारत के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। इस संकट का समाधान किसी कानून के
पास नहीं है। आज हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक को भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़ा होना है।
आपसी सद्भाव और सम्मान के साथ प्रेमभाव को बढ़ावा देना है। समाज के नेतृत्व व
संगठन का दायित्व राजनेताओं से छीनकर नि:स्वार्थ समाजसेवियों के हाथों में सौंपना
है। इस महान कार्य में समाज का हर एक वर्ग अपनी भूमिका निभा सकता है। राष्ट्रीय
एकता को बचाए रखना हमारा परम कर्तव्य है।
उपसंहार – भारत विश्व का एक महत्वपूर्ण जनतंत्र है। लम्बी पराधीनता के
बाद वह विकास के पथ पर अग्रसर है। भारत की प्रगति के लिए उसकी एकता-अखण्डता का बना
रहना आवश्यक है,
प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है कि
भारत की अखण्डता को सुनिश्चित करे।
(8) भारत के
उन्नति की ओर बढ़ते कदम
अथवा
भारत का उज्ज्वल भविष्य
अथवा
भारत का उज्ज्वल भविष्य
संकेत बिंदु –
·
उज्ज्वल भविष्य के संकेत
·
प्रगति के आधार
·
विविध क्षेत्रों में प्रगति
·
बाधाएँ और निराकरण
·
भारतीयों की भूमिका
उज्ज्वल भविष्य के संकेत – इक्कीसवीं सदी भारत की होगी। भारत विश्व की महाशक्ति बनेगा।
ऐसी घोषणाएँ भारत के राजनेताओं, अर्थशास्त्रियों और वैज्ञानिकों
ने की है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी भारत के उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणियाँ
की हैं। क्या यह सपना सच होगा ? क्या वास्तव में हम महाशक्ति, विकसित राष्ट्र बनने के मार्ग पर बढ़ रहे हैं ? इन प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है।
प्रगति के आधार – भारत की चहुंमुखी उन्नति के इन दावों और भविष्यवाणियों के
पीछे कुछ ठोस आधार दिखायी देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सभी क्षेत्रों
में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है। हमने अपने आपको विश्व का सबसे बड़ा और स्थिर
लोकतंत्र साबित किया है। हमारी अर्थव्यवस्था निरन्तर प्रगति कर रही है। पिछली
विश्वव्यापी मंदी को हमने अपनी सूझ-बूझ से परास्त किया है। हमारी अनेक कम्पनियों
ने विदेशी कम्पनियों का अधिग्रहण करके भारत की औद्योगिक कुशलता का प्रमाण दिया है।
हमारे शिक्षक,
वैज्ञानिक और उद्योगपति विदेशों में
भी अपनी प्रतिभा का डंका बजा रहे हैं। विज्ञान, चिकित्सा, व्यवसाय, कला, सैन्य-शक्ति, शिक्षा और संस्कृति, हर क्षेत्र में हमने नए-नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। ये
सभी बातें भारत के उज्ज्वल भविष्य में हमारा विश्वास दृढ़ करती हैं।
विविध क्षेत्रों में प्रगति – इसमें संदेह नहीं कि भारत ने विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय
प्रगति की है । हमारे वैज्ञानिकों ने अनेक मौलिक खोजें की हैं। अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा, अस्त्र-शस्त्रों का विकास, औद्योगिक कुशलता, दूर-संचार, परमाणु-शक्ति आदि क्षेत्रों में हमारी प्रगति उल्लेखनीय है।
आर्थिक क्षेत्र में हमारी प्रगति का प्रमाण हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिरता और
निरंतर विकास से मिलता है। जब विश्वव्यापी मंदी से संसार की बड़ी-बड़ी
अर्थव्यवस्थाएँ ढह रहीं थीं तब भारतीय अर्थव्यवस्था ने इससे अप्रभावित रहकर अपनी
विश्वसनीयता प्रमाणित की। विदेशी निवेश का बढ़ना और विदेशी कम्पनियों का अधिग्रहण
भी हमारी अर्थव्यवस्था की सफलता का प्रमाण देता है। इसके अतिरिक्त शिक्षा और
संस्कृति के क्षेत्र में भी हमने उल्लेखनीय प्रगति की है।
बाधाएँ और निराकरण – भारत की प्रगति-यात्रा के मार्ग में अनेक बाधाएँ भी हैं।
ढाँचागत सुविधाओं का अभाव, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराधीकरण, वोट की राजनीति, महिलाओं की उपेक्षा, आतंकवाद और नक्सलवाद आदि बाधाओं
पर विजय पाए बिना हमारे सारे सपने अधूरे रह जायेंगे । चरित्र की दृढ़ता, पारदर्शिता और दृढ़ प्रशासन, जनता
और सरकार का तालमेल आदि ऐसे उपाय हैं जिनसे हम इन बाधाओं को दूर कर सकते हैं।
भारतीयों की भूमिका – भारत के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में जनता की भी अनिवार्य
भूमिका है। जाति,
संप्रदाय, निजी स्वार्थ आदि को ठुकराकर आपसी सद्भाव स्थापित करना हर
नागरिक का कर्तव्य है। सभी भारतीय जन संगठित होकर बुराइयों का विनाश करें और
राष्ट्र की उन्नति में सहयोग करें तभी भारत विश्व की महाशक्ति बनेगा।
(9) राष्ट्रीय
विकास के लिए परिवार-नियोजन की आवश्यकता
प्रस्तावना – स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भारत विकास के पथ पर तेजी से
दौड़ रहा है। कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, संचार, सुरक्षा आदि क्षेत्रों में नित्य नई प्रगति हो रही है। इन
सबके साथ देश की जनसंख्या भी द्रुत गति से बढ़ रही है। अब हम एक अरब पच्चीस करोड़
से अधिक मानव-शक्ति वाला राष्ट्र बन चुके हैं।
बढ़ती हुई जनसंख्या का संकट – देश की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या हमारे लिए संकट का कारण
बन चुकी है। जनसंख्या की वृद्धि दो गुणा दो के गुणात्मक सिद्धान्त पर होती है जबकि
उत्पादन के साधनों की वृद्धि ‘एक धन एक’ के योग के सिद्धान्त से होती है अर्थात् जंबे आवश्यकता की
वस्तुएँ एक से दो होती हैं, तब तक उपभोक्ताजनों की संख्या
दो से चार हो जाती है। इस तरह विकास के सभी उपाय तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के
सामने छोटे पड़ जाते हैं और समाज में वस्तुओं का अभाव बना रहता है। भोजन, वस्त्र और आवास की कमी बढ़ती ही जाती है। यही बढ़ती हुई
जनसंख्या का संकट है।
जनसंख्या का दबाव – भारत में हर क्षेत्र में विकास हुआ है परन्तु उस पर जनसंख्या
वृद्धि का भीषण दबाव है। हरित क्रान्ति हुई है, खाद्य
पदार्थों की उपलब्धता बढ़ी है किन्तु फिर भी भूख की समस्या हल नहीं हो रही है। एक
बहुत बड़ी संख्या में लोगों को आधे पेट या खाली पेट रहना पड़ता है। इतने विशाल देश
में जगह का अभाव है। स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता, बीमार
होने पर अस्पताल में बैड नहीं मिलता, रेलों और बसों में सीट नहीं
मिलती। प्रत्येक क्षेत्र में अभाव है। माँग बढ़ती ही जा रही है। किन्तु आपूर्ति
नहीं बढ़ रही है। इतनी लम्बी-चौड़ी दुनिया है फिर भी इसमें जगह नहीं है। रहने को
घर नहीं है,
सारा जहाँ हमारा।
जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण – जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
अन्य देशों ने इस कार्य में सफलता पाई है। जापान का प्रयास अनुकरणीय है। चीन ने भी
अपनी जनसंख्या वृद्धि को कठोरता से नियंत्रित किया है। किन्तु हम इस दिशा को कोई
ठोस नीति ही निर्धारित नहीं कर सके हैं। हम लोगों को कुछ लालच देकर बढ़ती हुई
जनसंख्या को रोकने का भ्रम पाले बैठे हैं।
कारण – भारत में जनसंख्या पर नियन्त्रण न होने के अनेक कारण हैं।
यहाँ परिवार नियोजन पर बातें करना उचित नहीं माना जाता। बालक के जन्म को ईश्वर की
देन माना जाता है। पुत्र का जन्म परिवार के लिए आवश्यक और गौरवपूर्ण माना जाता है।
बेटा पैदा होने की आशा में बेटियों को बार-बार जन्म दिया जाता है। गरीब परिवार में
बच्चों को भी किसी काम में लगाकर कुछ न कुछ कमाई कराई जाती है। भारत में अनेक धर्म
और जातियों के लोग रहते हैं। कुछ समझदार लोगों को छोड़कर हर जाति-धर्म के लोग अपनी
संख्या बढ़ाने के विचार से परिवार नियोजन का विरोध करते हैं। सरकार केवल पुरस्कार
देकर परिवार नियोजन कराना चाहती है। इसके लिए किसी कठोर दण्ड की व्यवस्था नहीं
करती।
निवारण – परिवार नियोजन पर खुलकर विचार होना आवश्यक है। कवि, लेखकों, धार्मिक पुरुषों, राजनैतिक नेताओं तथा मीडिया के लोगों को इस पर खुलकर आन्दोलन
चलाना चाहिए। धर्म-जाति का भेदभाव छोड़कर जनसंख्या वृद्धि पर रोक के लिए एक समान
कानून बनाना चाहिए, इसके साथ ही सब्सिडी आदि के रूप
में मिलने वाली सरकारी सहायता भी उन्हीं लोगों को मिलनी चाहिए जो परिवार नियोजन को
अपनाएँ।
उपसंहार – परिवार नियोजन की उपेक्षा खतरनाक होगी। देश में भूखे-नंगों
की बढ़ती हुई संख्या विकास को ध्वस्त कर देगी। भयंकर अशांति और हिंसा भी होगी।
महामारी और युद्ध से भी भीषण संकट आयेगा। सब कुछ उलट-पुलट हो जायेगा, सरकारी योजनायें धरी की धरी रह जायेंगी। अतः उस विषय पर कहना
तो पड़ेगा ही,
कुछ करना भी पड़ेगा।
नहीं तो
इद वंश वृक्ष ऐसा बढ़ेगा
कि वन हो जायेगा
और कठिन ही नहीं,
असम्भव उसमें जीवन हो जायेगा।
इद वंश वृक्ष ऐसा बढ़ेगा
कि वन हो जायेगा
और कठिन ही नहीं,
असम्भव उसमें जीवन हो जायेगा।
(10) आजादी के 70 वर्ष : क्या खोया क्या पाया
रूपरेखा –
1.
प्रस्तावना
2.
आजादी की प्राप्ति
3.
जनतंत्र की स्थापना
4.
विगत वर्षों की उपलब्धियाँ-आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक, सुरक्षातंत्र
5.
क्या खोया?
6.
उपसंहार।
प्रस्तावना – मुगलों के शासन के पश्चात् भारत अंग्रेजी शासन के चंगुल में
फंस गया था। सन् 1857 की क्रान्ति के विफल होने के
पश्चात् पराधीनता की जकड़ और ज्यादा प्रबल हो गई थी। इस काल में भारत गम्भीर
निर्धनता के साथ अन्धविश्वासों की बेट्टियों में जकड़ा था। अशिक्षा और पिछड़ेपन ने
भी उसको घेर लिया था।
आजादी की प्राप्ति – नब्बे साल तक स्वतंत्रता के लिए भारतीयों को संघर्ष करना
पड़ा। स्वाधीनता के लिए होने वाले संघर्ष की दिशा मोड़ने के लिए ए. ओ. ह्यूम ने
काँग्रेस की स्थापना की। जब महात्मा गांधी भारत आए और काँग्रेस में उनका प्रभाव
बढ़ा तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा और दशा दोनों बदल गईं। पूरा देश उनके
पीछे एकजुट हो गया और सन् 1947 के पन्द्रह अगस्त को भारत को
स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
जनतंत्र की स्थापना – स्वाधीन भारत के सामने अनेक समस्याएँ थीं। देश बिखरा हुआ था।
अनेक रियासतों के होने के कारण भारत की एकता संकट में थी। तब सरदार पटेल के
प्रयासों से इनका भारतीय राष्ट्र में विलय हुआ। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड माउण्ट बेटन की कूटनीति के कारण कश्मीर भारत के लिए आज
भी समस्या बना हुआ है। राज्यों का पुनर्गठन भारत की महान उपलब्धि रही। भारतीय
संविधान का निर्माण हुआ और 26 जनवरी, सन् 1950 को भारत जनतंत्र बना।
विगत वर्षों की उपलब्धियाँ – आज भारत को स्वाधीन हुए कई दशक वर्ष बीत चुके हैं। इस बीच
देश ने अनेक आन्तरिक तथा बाह्य संकटों का सफलतापूर्वक सामना किया है। इस काल में
देश ने बहुत कुछ पाया है तो कुछ खोया भी है। हम यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में देश के
खोने-पाने का लेखा-जोखा संक्षेप में प्रस्तुत करेंगे –
(क) आर्थिक – सन् 1947 में देश में भयंकर निर्धनता थी।
आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी। खाद्यान्न का भीषण अभाव था। उद्योग-व्यापार चौपट था।
उसको सुधारने के लिए योजनाबद्ध प्रयासों की आवश्यकता थी। योजना आयोग (अब नीति
आयोग) के प्रयास से देश की आर्थिक दशा में बहुत सुधार हुआ है। देश में कृषि
उत्पादन बढ़ा है तथा उल्लेखनीय औद्योगिक प्रगति हुई है।
(ख) सामाजिक – विगत वर्षों में देश की विभिन्न जातियों में ऊँच-नीच, छूआछूत आदि को दूर करने में सफलता मिली है। सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने-अपने धर्म के अनुसार उपासना की स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। भारतीय समाज में अनेक जातियों और धर्मों के मानने वालों में समानता और राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ाने में सफलता मिली है।
(ग) राजनैतिक – देश में जनतंत्र स्थापित हुआ है। अनेक राजनैतिक दल बने हैं। इन दलों ने संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रनिर्माण का कार्य किया है। जनता में लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा हुई है तथा लोकतन्त्र भारत में मजबूत हुआ है। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
(घ) शैक्षिक – भारत में शिक्षा की दयनीय स्थिति में सुधार के प्रयास हुए हैं। नए-नए विद्यालय स्थापित हुए हैं। विद्यालयों में पढ़ने जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। लड़कियों को भी विद्यालयों में भेजा जा रहा है। शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार हुआ है। व्यावसायिक तथा प्राविधिक शिक्षा का भी विस्तार हुआ है।
(ङ) वैज्ञानिक – आज विज्ञान का युग है। भारत में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को पर्याप्त महत्त्व प्रदान किया गया है। किया गया है। विज्ञान के शिक्षण-प्रशिक्षण एवं शोध कार्य की व्यवस्था हुई है। हमारे वैज्ञानिक अपनी प्रतिभा से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में महान कार्य कर रहे हैं। अन्तर्महाद्वीपीय अस्त्रों तथा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने अद्वितीय प्रगति की है।
(च) सुरक्षातंत्र – सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत मजबूत हुआ है। अनेक नए वैज्ञानिक उपकरण देश में बनाए जा रहे हैं जिनका उपयोग देश की सुरक्षा के लिए हो रहा है । यद्यपि भारत ने अपने पड़ोसी देशों के अनेक आक्रमण सहन किये हैं किन्तु उनका सफलतापूर्वक सामना करते हुए देश की सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया है।
(ख) सामाजिक – विगत वर्षों में देश की विभिन्न जातियों में ऊँच-नीच, छूआछूत आदि को दूर करने में सफलता मिली है। सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने-अपने धर्म के अनुसार उपासना की स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। भारतीय समाज में अनेक जातियों और धर्मों के मानने वालों में समानता और राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ाने में सफलता मिली है।
(ग) राजनैतिक – देश में जनतंत्र स्थापित हुआ है। अनेक राजनैतिक दल बने हैं। इन दलों ने संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रनिर्माण का कार्य किया है। जनता में लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा हुई है तथा लोकतन्त्र भारत में मजबूत हुआ है। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
(घ) शैक्षिक – भारत में शिक्षा की दयनीय स्थिति में सुधार के प्रयास हुए हैं। नए-नए विद्यालय स्थापित हुए हैं। विद्यालयों में पढ़ने जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। लड़कियों को भी विद्यालयों में भेजा जा रहा है। शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार हुआ है। व्यावसायिक तथा प्राविधिक शिक्षा का भी विस्तार हुआ है।
(ङ) वैज्ञानिक – आज विज्ञान का युग है। भारत में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को पर्याप्त महत्त्व प्रदान किया गया है। किया गया है। विज्ञान के शिक्षण-प्रशिक्षण एवं शोध कार्य की व्यवस्था हुई है। हमारे वैज्ञानिक अपनी प्रतिभा से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में महान कार्य कर रहे हैं। अन्तर्महाद्वीपीय अस्त्रों तथा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने अद्वितीय प्रगति की है।
(च) सुरक्षातंत्र – सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत मजबूत हुआ है। अनेक नए वैज्ञानिक उपकरण देश में बनाए जा रहे हैं जिनका उपयोग देश की सुरक्षा के लिए हो रहा है । यद्यपि भारत ने अपने पड़ोसी देशों के अनेक आक्रमण सहन किये हैं किन्तु उनका सफलतापूर्वक सामना करते हुए देश की सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया है।
क्या खोया – विगत वर्षों में भारत ने अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं
किन्तु उसने कुछ खोया भी है। स्वाधीनता से पूर्व देश में हिन्दू-मुस्लिम
साम्प्रदायिकता नहीं थी। नियंत्रण के प्रयास के बाद भी इसमें वृद्धि हुई है। हमारे
स्वतंत्रता सेनानी एक जाति-मुक्त समाज बनाना चाहते थे किन्तु पिछले अनेक वर्षों
में वोट के लालची नेताओं ने जातिवाद को बढ़ावा दिया है जातिमुक्त समाज की रचना में
आरक्षण भी बाधक है। इससे सामाजिक एकता भी छिन्न-भिन्न हुई है। राजनीति में
सिद्धान्तहीनता घर कर चुकी है। इसमें बाहुबली नेताओं को बढ़ावा मिला है। सम्प्रदाय
और जाति राजनीति के दूषण हैं। आर्थिक क्षेत्र में प्रगति तो हुई है किन्तु अमीर और
अमीर तथा गरीब और गरीब हुए हैं। पूँजी का केन्द्रीयकरण हुआ है, फलत: देश का धन कुछ लोगों की मुट्ठी में बन्द है। जो बाह्य
चमक-दमक है,
उसके पीछे ऋण पर आधारित व्यवस्था है।
जीवन में सादगी और सरलता घटी और आपाधापी बढ़ी है।
उपसंहार – कहावत है-‘बीती ताहि बिसारिए, आगे की सुधि लेहु’! विगत कुछ वर्षों से घटित हो रही
राजनीतिक एवं सामाजिक परिवर्तन की घटनाएँ हमें यही सीख दे रही हैं। शासकों का
आत्मविश्वास दृढ़ हो रहा है। वे पारदर्शी तथा जनहितैषी शासन की ओर कदम बढ़ा रहे
हैं।
(11) अनेकता में
एकता : भारत की विशेषता
रूपरेखा –
1.
प्रस्तावना
2.
राष्ट्रीय और भावात्मक एकता का अर्थ
3.
राष्ट्रीय एकता और अखंडता की आवश्यकता
4.
देशवासियों का कर्तव्य
5.
उपसंहार
प्रस्तावना – हमारा भारत एक गुलदस्ता है जिसमें विभिन्न रंगों और सुगंध
वाले पुष्प जुड़े हुए हैं। जब ये पुष्प अलग होते हैं तो उनके रंग, खुशबू और नाम अलग-अलग होते हैं किन्तु उनके मिलने से जो बनता
है वह गुलदस्ता कहलाता है। गुलदस्ता बहुत सुन्दर होता है। भारत में अनेक धर्मों, जातियों, विचारों, संस्कृतियों और मान्यताओं से सम्बन्धित विभिन्नताएँ हैं
किन्तु उनके मेल से एक खूबसूरत देश का जन्म हुआ है, जिसे
हम भारत कहते हैं। भारत की ये विविधताएँ एकता में बदल गई हैं, जिसने इस देश को विश्व का एक सुन्दर और सबल राष्ट्र बना दिया
है।
राष्ट्रीय और भावात्मक एकता का अर्थ – राष्ट्र के प्रमाणक अंग तीन हैं- भूमि, निवासी और संस्कृति। एक राष्ट्र के दीर्घ-जीवन और सुरक्षा के
लिए इन तीनों का सही सम्बन्ध बना रहना परमावश्यक होता है। यदि किसी राष्ट्र की
भूमि से वहाँ के राष्ट्रवासी उदासीन हो जायेंगे तो राष्ट्र के विखण्डन का भय बना
रहेगा। 1962
ई. में चीन का आक्रमण और भारत की
हजारों किलोमीटर भूमि पर अधिकार इसका ज्वलंत उदाहरण है। राष्ट्र की भूमि माता के
तुल्य है। ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः यह भावना राष्ट्र की अखण्डता
के लिए परमावश्यक है।
राष्ट्रजनों को एक सूत्र में बाँधने वाली राष्ट्रीय संस्कृति
होती है। केवल एक स्थान पर निवास करने वाला जनसमूह राष्ट्र का निर्माण नहीं कर
सकता, जब तक कि वह परस्पर सांस्कृतिक सूत्र से न बँधा हो। धार्मिक
सद्भाव, सहयोग, पर्व, उत्सव, कला और साहित्य संस्कृति के अंग
हैं। इनका आदान-प्रदान राष्ट्रीय एकता को जन्म देता है। स्पष्ट है कि राष्ट्रीय
एकता और अखण्डता एक राष्ट्र के जीवन और समृद्धि के लिए अनिवार्य शर्ते हैं।
राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की आवश्यकता – आज भारत के अस्तित्व और सुरक्षा को गम्भीर चुनौतियाँ भीतर और
बाहर दोनों ओर से हैं। भीतर से प्रादेशिक संकीर्णता, धार्मिक
असहिष्णुता,
जातीय संकोच और स्वार्थपूर्ण राजनीति
देश को विखण्डन की ओर ले जा रही है और बाहर से पड़ोसी देशों के षड्यन्त्र हमको
तोड़ने पर कटिबद्ध हैं। देश में व्याप्त आतंकवादी गतिविधियाँ इसके स्पष्ट प्रमाण
हैं। इतिहास गवाह है कि भारतभूमि पर विदेशी आँखें निरन्तर ललचाती रही हैं। जब-जब
हम एक रहे, विजयी रहे, आक्रमण की बाढ़ हमारी एकता की
चट्टान से टकराकर चूर-चूर हो गई और जब हम बिखरे हमने मुँह की खाई, हम परतन्त्र हुए। हजारों वर्षों की अपमानजनक गुलामी हमें यही
सिखाती है कि एक होकर रहो, संगठित होकर रहो और एक राष्ट्र
बने रहो। विविध धर्मों, आचारों, भाषाओं और प्रदेशों वाले देश को तो एकता की अत्यन्त आवश्यकता
होती है।
देशवासियों का कर्तव्य – राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का उत्तरदायित्व केवल सरकार या
सेना पर नहीं होता। नागरिकों का यह परम धर्म है कि राष्ट्र के प्रति अपने
कर्त्तव्य से परिचित रहें और उसका पालन करें। छात्र वर्ग राष्ट्रीय एकता में अनेक
प्रकार से योगदान कर सकता है। उसे अपनी राष्ट्रीय संस्कृति और इतिहास का आदर करना
चाहिए और अपने जीवन में उसे झलकाना चाहिए। धर्माचार्यों को अपने प्रभाव का प्रयोग
कर देश में राष्ट्रभक्ति की धारा बहानी चाहिए।
समाज के अन्य वर्गों का उत्तरदायित्व भी इतना ही
महत्त्वपूर्ण है। वैज्ञानिक हों या व्यापारी, श्रमिक हों या श्रीमन्त, सबको राष्ट्र का हित ध्यान में रखकर चलना चाहिए। राष्ट्र
जिएगा तो सब जिएंगे। यदि राष्ट्र टूटा तो सेवको धराशायी और धूल-धूसरित होना
पड़ेगा।
उपसंहार – आज देश का राजनीतिक तथा सामाजिक वातावरण अनेक शंकाएँ उत्पन्न
करता है। लगता है जैसे हमने अपनी आचार, धर्म, संस्कृति, शिक्षा और शासन की परिकल्पना, सब कुछ जैसे राजनीति के हाथों गिरवी रख दिया है। जीवन की ‘बोट’ (नाव) हम वोट (मत) को सौंप चुके
हैं। याद रहे कि राष्ट्रीय एकता और अखण्डता भारतीयों के लिए जीवनमरण का प्रश्न है।
इस जलयान पर हम सभी सवार हैं। यह डूबता है तो हम सबको डूब जाना पड़ेगा। इस एकता के
कण्ठहार को सँभालकर रखना आज राष्ट्रधर्म है।
(12) मेरा प्यारा
भारत
अथवा
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
अथवा
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
रूपरेखा –
1.
प्रस्तावना
2.
भारत का भूगोल और प्रकृति
3.
इतिहास, सभ्यता
और संस्कृति
4.
विभिन्नता में एकता
5.
आधुनिक भारत
6.
उपसंहार।
प्रस्तावना – ये मेरा इण्डिया। अच्छा न लगे तो कहिए यह मेरा प्यारा भारत
हम इसको हिन्दुस्तान भी कहते हैं। इतिहास के पन्नों में इसके आर्यावर्त और
ब्रह्मवर्त नाम भी दर्ज हैं। मगर नाम में क्या रखा है? है तो यह हमारा प्यारा देश भारत ही। संसार के समस्त देशों
में अनुपम! इसकी विशेषताओं पर मुग्ध होकर ही कवि इकबाल ने लिखा था
‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।’
भारत का भूगोल और प्रकृति – हमारा हिन्दोस्तां दुनिया के सभी देशों में सर्वोत्तम है। कम
से कम भारतवासियों को तो ऐसा ही लगता है। लगे भी क्यों न? जब –
धुववासी जो हिम में, तम में, जी लेता है काँप-काँपकर
रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर।
रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर।
हमारा देश भारत तो प्राकृतिक सुषमा से भरापूरा है। इसकी
भौगोलिक स्थिति ने इसको सुखदायक देश का गौरव दिया है। यहाँ न ध्रुव प्रदेश जैसी
सर्दी पड़ती है और ने विषुवत् रेखा के प्रदेश जैसी भीषण गर्मी । इसकी ऋतुएँ परम
आनन्ददायिनी हैं। इसकी वर्षा जीवनदायिनी होती है और भारत को शस्य-श्यामला बनाती
है। भारत एशिया महाद्वीप के दक्षिण में स्थित है। अपनी विशालता तथा विविधता के
कारण यह उपमहाद्वीप की संज्ञा से जाना जाता है। इसके उत्तर में संसार का सर्वोच्च
पर्वत हिमालय है। यह पर्वतराज हिमालय भारत की उत्तरी सीमा का प्रहरी है। यह
बर्फीली हवाओं से भी भारत को बचाता है। इसके दक्षिण में हिन्द महासागर स्थित है जो
भारत के चरण धोता है। भारत में गंगा-यमुना, सिंधु, सतलज, व्यास, घाघरा आदि नदियाँ हैं, जिन्होंने उत्तर के मैदान को
बनाया है। इसमें विभिन्न प्रकार के अन्न और खाद्य पदार्थ उत्पन्न होते हैं। भारत
के प्राकृतिक सौन्दर्य के सम्बन्ध में कवि सोम ठाकुर ने लिखा है –
सागर चरन पखारे, गंगा शीश चढ़ावे नीर।
मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर॥
मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर॥
भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य पर मुग्ध होकर राष्ट्रकवि
मैथिलीशरण गुप्त ने इसे ईश्वर की साकार प्रतिमा बताया है-
नीलाम्बर परिधान हरित-पट पर सुन्दर है।
सूर्यचन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस देश की।
हे मातृभूमि तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की !
सूर्यचन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस देश की।
हे मातृभूमि तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की !
इतिहास, सभ्यता और संस्कृति – भारत का इतिहास बहुत पुराना तथा गौरवशाली है। ऋग्वेद विश्व
का सबसे पुराना ग्रन्थ है। जब आज का सभ्य यूरोप जंगली जातियों का घर था तब भारत
में सभ्यता विकसित हो चुकी थी। शतपथ ब्राह्मण तथा बाइबिल में देवजाति की जिस जल
प्रलय का उल्लेख मिलता है, उसका घटना स्थल हिमालय के
उत्तर-पश्चिम का क्षेत्र था। उस जल प्रलय में देवजाति नष्ट हो गई। केवल मनु बचे
थे। उनकी नौका हिमालय पर अटक गई थी। जल उतरने पर मनु हिमालय से नीचे उतरे। उनकी
सन्तान ही मनुज या मानव है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने भारत को ही आर्यों का आदि देश
माना है। आर्य कहीं बाहर से आये थे, वह इस मत के समर्थक नहीं हैं –
हमारी जन्मभूमि है यही। कहीं से हमें आये थे नहीं।
हजारों वर्षों में भारत ने सभ्यता के अनेक उतार-चढ़ाव देखे
हैं। भारत की सभ्यता और संस्कृति अत्यन्त पुरानी है। वह निरन्तर परिवर्तित और
विकसित होती रही है। भारतीय संस्कृति, त्याग, प्रेम और शांति की संस्कृति है। बौद्ध, जैन, सिख आदि भारतीय मत तथा पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि विदेशी मतों को भी यहाँ रहकर अपना विकास करने की
स्वतन्त्रता प्राप्त हुई है। सर्वधर्म समन्वय तथा सहिष्णुता भारत की सभ्यता और
संस्कृति की दृढ़ मान्यताएँ हैं –
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।
विभिन्नता में एकता – भारत की सर्वप्रमुख विशेषता विभिन्नता में एकता है। यहाँ
अनेक धर्म, मत, जाति के लोग रहते हैं। उनकी
खान-पान तथा पहनावा भी भिन्न-भिन्न है परन्तु वे सभी भारतीय हैं। भारत की यह
विविधता उसके भूगोल तथा जलवायु में भी दिखाई देती है। भारत के निवासियों के शारीरिक
गठन तथा रूप-रंग में भी भिन्नता है परन्तु उनकी भारतीयता में भिन्नता नहीं है।
भारत में अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ उगती हैं, तरह-तरह
के रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, भाँति-भाँति के पशु-पक्षी यहाँ
पाये जाते हैं। इन सबकी एकरूपता ही भारत है। भारत ने हरेक को अपनाया है और शरण दी
है, शरणागत वत्सलता भारत की संस्कृति का प्रमुख गुण है। कवि
जयशंकर प्रसाद ने लिखा है –
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल
मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किये, समझ नीड़ निज प्यारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किये, समझ नीड़ निज प्यारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
आधुनिक भारत – भारत विश्व का प्राचीनतम देश है। लम्बी दासता से मुक्त होकर
आज भारत नवनिर्माण के पथ पर तेजी से बढ़ रहा है। सुभद्रा कुमारी चौहान के शब्दों
में कहें तो “बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी”। एक सौ बीस करोड़ की जनसंख्या वाला भारत आज संसार का सबसे
बड़ा गणतन्त्र है। भारतीयों ने प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के झण्डे गाड़े हैं।
आगामी दशाब्दियों में ही हमारा भारत विश्व की आर्थिक और
सामरिक महाशक्ति बनने को तैयार है। स्वतन्त्रता और समानता का संदेश विश्व को देते
हुए हम स्वयं भी इसी पथ पर आगे बढ़ रहे हैं।
उपसंहार – हमारा अतीत गौरवशाली रहा है और भविष्य उज्ज्वल है। हमें अपने
मतभेद भुलाकर देश को विश्व में उसका उचित स्थान दिलाना है।
जियें तो सदा इसी के लिए, यही
अभिमान रहे यह हर्ष।
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।
(13) विकास पथ पर
भारत
रूपरेखा –
1.
प्रस्तावना
2.
विकास के विभिन्न सोपान
3.
विकास में बाधक तत्त्व
4.
उपसंहार
प्रस्तावना –15 अगस्त
1947 को सैकड़ों वर्षों के दमन, अत्याचार, शोषण और पराधीनता के. कुत्सित पंक से एक पंकज प्रस्फुटित हुआ
था-‘स्वतन्त्र-भारत’; स्वतन्त्र और स्वाभिमान से
गर्वोन्नत भारत,
विश्वभर के स्वाधीनता संग्रामों की
आशाओं का आकाश-दीप भारत। तब से आज तक हमारा भारत निरन्तर विकास के पथ पर अग्रसर हो
रहा है। आज हमारे राजनेता भारत को शीघ्र ही महाशक्ति बनाने का सपना देखने लगे हैं।
विकास के विभिन्न सोपान-देश के विकास के विभिन्न सोपानों को
निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है –
भोजन, वस्त्र
और आवास के क्षेत्र में – कभी देश को बाहर से अन्न का
आयात करना पड़ता था, आज हरित क्रान्ति के बल पर हम
अनाज निर्यात करने की स्थिति में आ गये हैं वस्त्रों का निर्यात भी हो रहा है।
भवन-निर्माण की सामग्री देश में उपलब्ध है। कॉलोनियों का अबाध विस्तार हो रहा है।
चिकित्सा के क्षेत्र में – स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में भी देश ने उल्लेखनीय
प्रगति की है। स्वास्थ्य केन्द्र तथा चिकित्सालयों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि
हुई है। अनेक जटिल तथा असाध्य रोगों की चिकित्सा अब देश में उपलब्ध है। अफ्रीका और
अरब देशों के नागरिक अब यूरोप के स्थान पर भारत आकर चिकित्सा कराना उचित समझते
हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में – अशिक्षा के कलंक को मिटाने का भी देश में अथक प्रयास हुआ है।
प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है। प्रौढ़-शिक्षा जैसे आन्दोलन भी चलते रहे
हैं। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने का कानून पारित हो चुका है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में – हमारा भारत वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी दृष्टि से भी विश्व के
अनेक विकसित देशों की श्रेणी में आ गया है। साइकिल से लेकर अन्तरिक्ष यान तक देश
में बन रहे हैं। परमाणु विज्ञान, धातु विज्ञान, अन्तरिक्ष अनुसन्धान, सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, शस्य विज्ञान आदि पर निरन्तर
अनुसन्धान हो रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी में तो भारत ने सारे विश्व में अपनी धाक
जमा ली है।
हमारी अनेक कम्पनियाँ विदेशों में नामी कम्पनियों का
अधिग्रहण कर रही हैं। टाटा स्टील द्वारा कोरस का अधिग्रहण इसे दिशा में उल्लेखनीय
है। सॉफ्टवेयर व्यवसाये में तो भारत की धूम मची हुई है। निर्यात व्यापार में भी
उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। विदेशी मुद्रा भण्डार निरन्तर बढ़ता जा रहा है।
सुरक्षा के क्षेत्र में – सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत अब किसी से पीछे नहीं है।
परम्परागत तथा नवीनतम अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण देश में हो रहा है। टैंक, रडार, मिसाइल, लड़ाकू यान, ‘पृथ्वी’, ‘त्रिशूल’, ‘अग्नि’ आदि प्रक्षेपास्त्रों का विकास देश को सुरक्षा के प्रति
आश्वस्त बना रहा है। हम विश्व की परमाणु शक्ति बन चुके हैं। अमेरिका से हुआ
परमाणु-समझौता उल्लेखनीय है। अग्नि 5 मिसाइल का सफल परीक्षण भारत की
बढ़ती सुरक्षा व्यवस्था का प्रमाण है।
आर्थिक क्षेत्र में – देश का शेयर बाजार आत्मविश्वास से परिपूर्ण है। गत वर्षों
में आर्थिक प्रगति 8 से 10 प्रतिशत रही है। विदेशी पूँजी का निवेश निरन्तर बढ़ रहा है।
ये सारे मानदण्ड देश के विकास को प्रमाणित करते हैं। जब अमेरिका और यूरोपीय देशों
में मंदी तथा बेरोजगारी बढ़ रही है, भारत में विकास दर ठीक बनी रहने
की उम्मीद है।
विकास में बाधक तत्व – विकास की उपर्युक्त छवि बड़ी मनमोहिनी है। किन्तु विकास का
यह प्रकाश अभी देश के लाखों गाँवों तक पूरी तरह नहीं पहुँचा है। विकास के मार्ग
में अनेक ऐसे बाधक तत्त्व हैं जो विकास की धारा को जन-जन तक नहीं पहुँचने देते।
भ्रष्टाचार,
जनसंख्या की वृद्धि, राष्ट्रीय भावना का क्षरण, जीवन-मूल्यों
के प्रति अनादर,
विदेशी षड्यन्त्र, बेरोजगारी, जातिवाद, साम्प्रदायिकता आदि कारक हैं, जो
देश की प्रगति में बाधक बने हुए हैं।
उपसंहार – अन्त में यही कहा जा सकता है कि देश ने हर दिशा में विकास
किया है। विश्व में भारत की विश्वसनीयता बढ़ी है, किन्तु
अभी मंजिल दूर है। अर्थशास्त्रियों ने देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिये कुछ
मूलमन्त्र सुझाए हैं किन्तु आज की कुटिल राजनीति, सत्ता-लोलुपता
और जनता का दिग्भ्रमित रूप इसे साकार होने देंगे, इसमें
सन्देह है।
(14)
जल है तो जीवन है।
अथवा
विश्व में गहराता जलसंकट
जल है तो जीवन है।
अथवा
विश्व में गहराता जलसंकट
रूपरेखा –
1.
प्रस्तावना
2.
जल का महत्त्व
3.
जलाभाव का परिणाम
4.
जल की उपलब्धता
5.
भावी जल संकट
6.
उपसंहारे।
प्रस्तावना – वेदों में कहा गया है-‘आप एव ससर्जादौ’ अर्थात् परमात्मा ने सबसे पहले जल की सृष्टि की। पुराणों में
विष्णु के प्रथम अवतार वाराह द्वारा जलमग्न पृथ्वी का उद्धार किए जाने का वर्णन
मिलता है। प्रलये अर्थात् सृष्टि का अन्त होने पर समस्त धरती जलमग्न हो जाती है।
इन बातों को हम मिथक कह सकते हैं, किन्तु विज्ञान के अनुसार जेल
जीवन या जीव-सृष्टि की प्रथम शर्त है। चन्द्रमा या मंगल पर जीवन की खोज में जुटे
वैज्ञानिकों की आशा का बिन्दु भी, वहाँ कहीं न कहीं जल की
उपस्थिति पर ही टिका है। शब्दकोश भी जल और जीवन को पर्यायवाची बताता है।
जल का महत्त्व – सम्पूर्ण सौरमण्डल में आज तक ज्ञात ग्रहों में पृथ्वी ही एक
ऐसा ग्रह है जहाँ जल का अपार भण्डार है। जल के बिना जीवन की कल्पना ही असम्भव है।
जल ने ही पृथ्वी पर चर-अचर जीव जगत् को सम्भव बनाया है। जीवाणु से लेकर स्थूलतम
जीव हाथी तक और शैवाल से लेकर गगनचुम्बी वृक्षों तक सभी का जीवनाधार जल ही है।
मानव शरीर में भी सर्वाधिक मात्री जल की ही है। जल की कमी हो जाने पर जीवन के लाले
पड़ जाते हैं और कृत्रिम उपायों से शरीर में उसकी पूर्ति करनी पड़ती है। हमारे
भोजन, वस्त्र, भवन, स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संतुलन
सभी के लिए जल का कोई विकल्प नहीं है। हमारी सुख-सुविधा, आमोद-प्रमोद और मनोरंजन भी जल से जुड़ा हुआ है। घरों में
कपड़े धोने,
भोजन बनाने, स्नान करने और गर्मी से बचने को कूलर चलाने में जल ही सहायक
होता है। जलाशयों में तैरकर और नौकाविहार करके हम आनन्दित होते हैं। हमारी
गृह-वाटिकाओं में जल चाहिए। पार्को और वनांचलों की हरियाली जल पर ही टिकी है। जल
के बिना कृषि की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जीवन के अस्तित्व और पोषण से जुड़ी किसी
भी वस्तु को देख लीजिए, किसी न किसी स्तर पर उसे जल के
योगदान की आवश्यकता अवश्य होती है।
जलाभाव को परिणाम – कल्पना कीजिए कि पृथ्वी कभी जल-विहीन हो जाय तो क्या दृश्य
उपस्थित होगा ?
सारा जीव जगत् तड़प-तड़प कर दम
तोड़ेगा। यह मनोरम हरीतिमा, ये इठलाती नदियाँ, झर-झर करते निर्झर, लहराते सागर, रिमझिम बरसते मेघ, ये चहल-पहल, दौड़ते वाहन, नृत्य-संगीत के आयोजन, ये मारामारी, सब कुछ नामशेष हो जाएँगे।
जल की उपलब्धता – प्रकृति ने जीवनाधार जल की प्रभूत मात्रा मानव जाति को
उपलब्ध कराई है। पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई भाग जलावृत है। इसमें मानवोपयोगी जल की
मात्रा भी कम नहीं है। नदियों, सरोवरों, झीलों आदि के रूप में पेयजल उपलब्ध है।
भावी जल – संकट – आज प्रकृति के इस नि:शुल्क उपहार पर संकट के बादल मँडरा रहे
हैं। नगरों और महानगरों के अबाध विस्तार ने तथा औद्योगीकरण के उन्माद ने भूगर्भीय
जल के मनमाने दोहन और अपव्यय को प्रोत्साहित किया है। भारत के अनेक प्रदेश, जिनमें राजस्थान भी सम्मिलित है, जल स्तर के निरंतर गिरने से संकटग्रस्त हैं। जल की उपलब्धता
निरंतर कम होती जा रही है। इस संकट के लिए मनुष्य ही प्रधान रूप से उत्तरदायी है।
अति औद्योगीकरण से बढ़ रहे भूमण्डलीय ताप (ग्लोबल वार्मिंग) से, ध्रुवीय हिम तथा ग्लेशियरों के शीघ्रता से पिघलने की आशंका
व्यक्त की जा रही है। वैज्ञानिक घोषणा कर रहे हैं कि अगली तीन-चार दशाब्दियों में
गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि का केवल नाम ही
शेष रह जाएगा। हिम तथा ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा तथा
समुद्र तट पर बसे शहर खत्म हो जायेंगे।
उपसंहार – जल है तो जीवन है’ इस सच को राजस्थान से अधिक और
कौन जानता है। जल जैसी बहुमूल्य वस्तु के प्रति हमारा उपेक्षापूर्ण रवैया कितना
घातक हो सकता है,
यह उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है। अतः
अभी से जल–प्रबंधन के प्रति जागरूक होना हमारे लिए जीवित रहने की शर्त
बन गया है। अतः परम्परागत एवं आधुनिक तकनीकों से जल के संरक्षण और भंडारण का कार्य
युद्ध-स्तर पर होना चाहिए। जनता और प्रशासन दोनों के उद्योग और सहयोग से ही इस
भावी संकट से पार पाना सम्भव है।
(15)
भारतीय कृषक
अथवा
किसान-भारत की पहचान
भारतीय कृषक
अथवा
किसान-भारत की पहचान
रूपरेखा –
1.
प्रस्तावना
2.
सरल तथा प्राकृतिक जीवन
3.
संसार का अन्नदाता
4.
भारतीय किसान की दशा
5.
समाज तथा शासन की उपेक्षा
6.
पिछड़ेपन का कारण
7.
किसान की दशा में सुधार
8.
उपसंहार।
प्रस्तावना – कृषि कर्म करने वाला ही कृषक कहलाता है। खेती संसार का सबसे
पुराना व्यवसाय है। यह मनुष्य के सभ्यता की ओर उन्मुख होने की प्रथम चरण है। भारत
गाँवों में बसता है, कहने का यही अर्थ है कि भारत की
बहुसंख्यक जनता किसान है और किसान गाँवों में ही रहते हैं। ‘भारतमाता ग्रामवासिनी’ कहकर कवि पंत ने इसी तथ्य ओर
संकेत किया है। किसान भारत की पहचान है।
सरल तथा प्राकृतिक जीवन – भारतीय किसान का जीवन दिखावट से दूर है। वह सरल और प्राकृतिक
जीवन जीता है। वह मोटा खाता और मोटा पहनता है। उसकी आवश्यकताएँ सीमित हैं। वह
वर्षा, धूप और सर्दी सहन करता है। प्रातः जल्दी उठना, अपने खेतों तथा पशुओं की देखभाल करना और कठोर श्रमपूर्ण जीवन
बिताना ही उसकी दिनचर्या है।
संसार का अन्नदाता – किसान समस्त संसार का अन्नदाता है। वह अपने खेतों में जो
अन्न उगाता है,
उससे ही संसार का पेट भरता है।
खाद्यान्न ही नहीं वह अन्य वस्तुएँ भी अपने खेतों में पैदा करता है। वह कपास उगाता
है, जो लोगों के तन ढकने के लिए वस्त्र बनाने के काम आती है। वह
गन्ना पैदा करता है जो गुड़ और शक्कर के रूप में लोगों को मधुरता देता है। वह तिल, सरसों, अलसी आदि तिलहन पैदा करता है जो
मनुष्य की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है। किसान साग-सब्जी, फल इत्यादि का उत्पादन करके लोगों की आवश्यकताएँ पूरी करता
है। उसी के प्रयत्न से पशुओं को चारा भी मिलता है।
भारतीय किसान की दशा – समाज के लिए इतना सब करने वाले किसान की दशा अच्छी नहीं है।
उसकी आर्थिक स्थिति दयनीय है। कृषि में जो पैदावार होती है, उसका पूरा मूल्य उसको नहीं मिल पाता। कृषि से इतनी आय नहीं
होती कि वह अपने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति कर सके। उसको तथा उसके परिवार को न
भरपेट भोजन मिल पाता है न अच्छे वस्त्र । शादी-विवाह इत्यादि पारिवारिक
उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए किसान को ऋण लेना पड़ता है।
समाज तथा शासन की उपेक्षा – किसान समाज तथा शासन की उपेक्षा का शिकार है। खेतों के लिए
बीज, खाद, कृषि उपकरण तथा पानी चाहिए जो
अत्यन्त महँगे हैं। इसके लिए वह महाजनों तथा बैंकों से ऋण लेता है। ऋण की शर्ते
ऐसी होती हैं कि वह संकट में पड़ जाता है। जब ऋण नहीं चुका पाता तो महाजन तथा
बैंकें उसकी सम्पत्ति नीलाम कर देते हैं। किसानों द्वारा निरन्तर आत्महत्याएँ किया
जाना इसी उपेक्षा का करुण परिणाम हैं।
भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र को विदेशी पूँजी निवेश के लिए
खोल दिया है। सरकार का कहना है कि वह किसान को उसकी उपज का अच्छा मूल्य दिलाना
चाहती है। बड़े-बड़े देशी-विदेशी पूँजीपति खेती को एक उद्योग का रूप देकर किसान का
शोषण करेंगे। वह अपने आर्थिक लाभ के लिए फसल उगायेंगे, इससे जनता के समक्ष खाद्यान्न का संकट भी पैदा होगा। उनको न
किसान के हित की चिन्ता है और न जनता के हित की।
पिछड़ेपन के कारण – भारत का किसान पिछड़ा हुआ है। वह अशिक्षित है तथा असंगठित भी
है। उसको उत्तम और नई कृषि प्रणाली का पर्याप्त ज्ञान नहीं है। संगठित न होने के
कारण उसे सरकार तथा पूँजीपति वर्ग का शोषण सहन करना पड़ता है। वह सरकार को कृषक हितैषी
नीति अपनाने को बाध्य नहीं कर पाता। भारतीय किसान अन्धविश्वासी भी है अतः अपनी
दुर्दशा को वह अपना दुर्भाग्य मानकर चुपचाप सहन कर लेता है। अपने शोषण के प्रतिकार
की भावना ही उसके मन में नहीं उठती ।।
किसान की दशा में सुधार – भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है परन्तु स्वतंत्र भारत
की सरकारों ने इस ओर ध्यान । नहीं। दिया वह उद्योगों के विकास द्वारा भारत को
सम्पन्न बनाने की नीति पर चलती रही है, यह नीति उचित नहीं है। सरकार को
अपनी नीति कृषि के विकास को आधार बनाकर बनानी चाहिए। किसानों को खेती की प्रगति
तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। उनको इसके लिए बजट में
पर्याप्त धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। किसानों के बच्चों की शिक्षा की उचित
व्यवस्था होनी चाहिए उनको कृषि की नवीनतम तकनीक का प्रशिक्षण तथा ज्ञान दिया जाना
चाहिए। कृषि को समुन्नत बनाकर तथा कृषकों का स्तर उठाकर ही भारत को समृद्ध तथा
शक्तिशाली बनाया जा सकता है। लगता है उत्तरदायी सरकारों ने इस कठोर सत्य को
स्वीकार किया है । किसानों को उनकी लागत का दुगुना बाजार-मूल्य दिलाने, प्राकृतिक आपदाओं के समय के लिए सही बीमा नीति बनाने, ऋण माफी आदि की घोषणाएँ भी हुई हैं। आशा है भारतीय किसान के
दिन बहुरेंगे।
उपसंहार – आज भारत स्वाधीन है तथा जनतंत्र सत्ता से शासित है। भारत की
अधिकांश जनता गाँवों में रहती है तथा कृषि और उससे सम्बन्धित व्यवसायों से अपना
जीवनयापन करती है। उसके आर्थिक उत्थान पर ध्यान देना आवश्यक है। अभी तक वह
उपेक्षित और असंतुष्ट है। असंतोष का यह ज्वालामुखी फूटे और भीषण विनाश का दृश्य
उपस्थित हो,
उससे पूर्व ही हमें सजग हो जाना
चाहिए।
गुर्जर इतिहास /मारवाड़ी कविता/NEW UPDATE/ RBSE /BSER CLASS – 12/10 नोट्स के लिए ब्लॉग पढे :-https://gurjarithas.blogspot.com
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