कक्षा-12 विषय- हिन्दी अनिवार्य
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पाठ -12 ‘बाजार दर्शन’
लेखिका परिचय- जैनेंद्र कुमार
जीवन परिचय-
- · प्रसिद्ध उपन्यासकार जैनेंद्र कुमार का जन्म 2 जनवरी, 1905 ई० में अलीगढ़ के कौड़ियागंज नामक स्थान पर ।
- · बचपन में ही इनके पिता जी का देहांत हो गया तथा इनके मामा ने ही इनका पालन-पोषण किया।
- · माता का नाम – श्रीमती राम देवी
- पिता का नाम – श्री प्यारेलाल
- · इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा हस्तिनापुर के गुरुकुल में हुई।
- · उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस में ग्रहण की।
- · 1921 ई० में गांधी जी के प्रभाव के कारण इन्होंने पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन में भाग लिया।
- · इनकी साहित्य-सेवा के कारण 1984 ई० में इन्हें ‘भारत-भारती’ सम्मान मिला।
- · भारत सरकार ने इन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।
- · इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
- · इनका देहांत सन 24 दिसम्बर, 1988 दिल्ली में हुआ।
- · इनकी पहली कहानी सन् 1928 ई. में “खेल” शीर्षक से “विशाल भारत” में प्रकाशित हुई. सन् 1929 ई. में इनका पहला उपन्यास ‘परख‘ नाम से प्रकाशित हुआ, जिस पर ‘हिन्दुस्तानी अकादमी‘ ने 500 रूपये का पुरस्कार प्रदान किया.
रचनाएँ – इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं।
उपन्यास – परख, अनाम स्वामी, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, जयवदर्धन, मुक्तिबोध ।
कहानी – संग्रह-वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ फाँसी, नीलम देश की राजकन्या, पाजेब।
निबंध-संग्रह – प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार, समय और हम।
साहित्यिक विशेषताएँ –हिंदी कथा
साहित्य में प्रेमचंद के बाद सबसे महत्वपूर्ण कथाकार के रूप में जैनेंद्र कुमार
प्रतिष्ठित हुए।इन्होंने अपने उपन्यासों व कहानियों के माध्यम से हिंदी में एक
सशक्त मनोवैज्ञानिक कथा-धारा का प्रवर्तन किया।
भाषा-शैली-जैनेंद्र जी
की भाषा-शैली अत्यंत सरल, सहज व भावानुकूल है
जिसमें तत्सम शब्दों का प्रयोग बहुलता से हुआ है परंतु तद्भव और उर्दू-फ़ारसी भाषा
के शब्दों का प्रयोग अत्यंत सहजता से हुआ है।
‘बाजार
दर्शन’ पाठ में आये महत्वपूर्ण मुहावरे
·
'मन खाली होने का अर्थ -निश्चित
लक्ष्य न होना।
·
‘मन बंद होने का अर्थ - इच्छाओं
का समाप्त हो जाना।
·
मन भरा होना- मन लक्ष्य से भरा होना।
‘बाजार
दर्शन’
·
बाजार दर्शन’ जैनेन्द्र का विचारप्रधान निबन्ध
है।
·
‘बाजार दर्शन’ निबंध
में गहरी वैचारिकता व साहित्य के सुलभ लालित्य का संयोग है।
·
कई दशक पहले लिखा गया यह लेख आज भी
उपभोक्तावाद व बाजारवाद को समझाने में बेजोड़ है।
·
जैनेंद्र जी अपने परिचितों, मित्रों से जुड़े अनुभव बताते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि बाजार
की जादुई ताकत मनुष्य को अपना गुलाम बना लेती है।
·
यदि हम अपनी आवश्यकताओं को ठीक-ठीक समझकर
बाजार का उपयोग करें तो उसका लाभ उठा सकते हैं।
·
इसके विपरीत, बाजार की
चमक-दमक में फेंसने के बाद हम असंतोष, तृष्णा और
ईष्या से घायल होकर सदा के लिए बेकार हो सकते हैं।
·
लेखक ने कहीं दार्शनिक अंदाज में तो कहीं
किस्सागो की तरह अपनी बात समझाने की कोशिश की है।
·
इस क्रम में इन्होंने केवल बाजार का पोषण
करने वाले अर्थशास्त्र को अनीतिशास्त्र बताया है।
·
“बाजार में एक जादू
है।”—यह कहने का तात्पर्य यह है कि बाजार ग्राहक को आकर्षित करता है। वहाँ सुन्दर
ढंग से सजी चीजों को देखकर मनुष्य उनको खरीदने के लिए मजबूर हो जाता है। यह जादू
उन पर प्रभाव डालता है जिनको अपनी आवश्यकताओं का पता नहीं होता और जेब में खूब
पैसा होता है।
पाठ का सारांश- बाजार-दर्शन
पाठ में बाजारवाद और उपभोक्तावाद के साथ-साथ अर्थनीति एवं दर्शन से संबंधित
प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया गया है। बाजार का
जादू तभी असर करता है जब मन खाली हो। बाजार के जादू को रोकने का उपाय यह है
कि बाजार जाते समय मन खाली ना हो, मन में लक्ष्य भरा हो।
बाजार की असली कृतार्थता है जरूरत के वक्त काम आना बाजार
को वही मनुष्य लाभ दे सकता है जो वास्तव में अपनी आवश्यकता
के अनुसार खरीदना चाहता है जो लोग अपने पैसों के घमंड में अपनी पर्चेजिंग
पावर को दिखाने के लिए चीजें खरीदते हैं वे बाजार को शैतानी व्यंग्य शक्ति देते
हैं। ऐसे लोग बाजारूपन और कपट बढ़ाते हैं। पैसे की यह व्यंग्य शक्ति व्यक्ति को
अपने सगे लोगों के प्रति भी कृतघ्र बना सकती है। साधारण जन का हृदय लालसा, ईर्ष्या
और तृष्णा से जलने लगता है। दूसरी ओर ऐसा व्यक्ति जिसके मन में लेश मात्र भी लोभ
और तृष्णा नहीं है,
संचय की इच्छा नहीं है वह इस
व्यंग्य-शक्ति से बचा रहता है। भगतजी ऐसे ही आत्मबल के धनी आदर्श ग्राहक और बेचक
हैं जिन पर पैसे की व्यंग्य-शक्ति का कोई असर नहीं होता। अनेक उदाहरणों के द्वारा
लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि एक ओर बाजार,लालची, असंतोषी
और खोखले मन वाले व्यक्तियों को लूटने के लिए है वहीं दूसरी ओर संतोषी मन वालों के
लिए बाजार की चमक-दमक,
उसका आकर्षण कोई महत्त्व नहीं रखता।